ग्वालियर-शहर के बीचाेंबीच सिटी सेंटर स्थित रक्षा अनुसंधान (डीआरडीओ) से 200 मीटर के दायरे में हा़े चुके निर्माण के मामले में हाईकोर्ट ने संपत्ति मालिकों को राहत न देकर इस दायरे में हुए सभी निर्माण कार्यों को अतिक्रमण की श्रेणी में रखकर तोड़ने का आदेश दिया है। मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस संजय यादव एवं जस्टिस विवेक अग्रवाल ने आदेश में स्पष्ट किया है कि वर्ष 2005 से पहले जिन लोगों ने निर्माण किया था उन्हें मुआवजा दिया जाए। उधर, 2005 के बाद निर्माण करने वाले लोगों को कोई मुआवजा नहीं दिया जाए। इसमें नगर निगम, जीवाजी विश्वविद्यालय और शासन की संपत्तियों सहित सभी निजी संपत्तियां भी शामिल हैं। कोर्ट ने पीड़ित पक्ष को डीआरडीओ के कमांडिंग ऑफिसर के सामने अपना पक्ष रखने की छूट भी दी है।
हाईकोर्ट ने नहीं स्वीकारा शिफ्टिंग का आग्रह…
ऐसे समझें, हाईकोर्ट का आदेश और उससे होने वाला असर
कार्रवाई: रक्षा अनुसंधान की जमीन के 200 मीटर के दायरे में आने वाली सभी सरकारी और निजी इमारताें को अतिक्रमण की श्रेणी में रखते हुए ताेड़ा जाएगा। रक्षा अनुसंधान के आसपास प्रतिबंधित क्षेत्र में कोई निर्माण नहीं रहेगा। कार्रवाई की हद में 84 निजी और 38 सरकारी इमारतें आ रही हैं।
आगे क्या: एडवोकेट संजय द्विवेदी के अनुसार, हाईकोर्ट के इस आदेश से राहत पाने के लिए संपत्ति मालिकों के पास दो विकल्प हैं। जिनमें से पहला विकल्प रिव्यू पिटीशन लगाई जा सकती है और दूसरा रास्ता, सुप्रीम कोर्ट में अपील का है। ये संपत्ति मालिकों पर निर्भर करता है कि वे कौन सा विकल्प चुनते हैं।
मुआवजा: हाईकोर्ट ने आदेश में स्पष्ट कहा है कि वर्ष 2005 से पहले हुए निर्माण के मालिकों को मुआवजा देकर निर्माण हटाया जाए। वहीं, 2005 के बाद हुए किसी भी निर्माण पर कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा। क्योंकि, 2005 में इस क्षेत्र में 200 मीटर तक निर्माण पर रोक संबंधी नोटिफिकेशन जारी किया गया था।
चार साल में याचिका का निपटारा
राजेश भदौरिया ने एडवोकेट पवन द्विवेदी के माध्यम से 2015 में जनहित याचिका पेश की थी कि सुरक्षा कारणों के चलते रक्षा अनुसंधान के 200 मीटर क्षेत्र में किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है। लेकिन प्रतिबंधित क्षेत्र में कई इमारतें बन चुकी हैं। कोर्ट द्वारा कार्रवाई की जानकारी मांगने पर जुलाई-अगस्त 2018 में नगर निगम ने एमपी नगर सिटी सेंटर में तुड़ाई शुरू कर दी। फिर ये मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया और वहां से आदेश हुए कि नगर निगम संपत्ति मालिकों के अभ्यावेदन लेकर निराकरण करें। नगर निगम ने सभी लोगों के अभ्यावेदन नियम विरूद्ध निर्माण का हवाला देते हुए खारिज कर दिए थे।
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