ग्वालियर
जेयू में गलत तरीके से पीएचडी अवार्ड करने के मामले में हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए जांच आयोग गठित कर दिया है। मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच के जस्टिस संजय यादव एवं जस्टिस विवेक अग्रवाल ने इस आयोग का अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस डीके पालीवाल को बनाया है। यह आयोग जेयू से जारी पीएचडी डिग्री की जांच करेगा और 4 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपेगा। यह पहला मौका है, जब यूनिवर्सिटी में हुई गड़बड़ियों के मामले में हाईकोर्ट ने जांच आयोग बनाया है। आदेश में कहा गया है कि जेयू के रजिस्ट्रार द्वारा आयोग को जांच से संबंधित सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे। याचिकाकर्ता ललित खरे के एडवोकेट नितिन अग्रवाल ने बताया कि जेयू से लगातार फर्जी तरीके से पीएचडी के मामले सामने आने पर श्री खरे ने दस्तावेज जुटाकर याचिका दायर की हैै। जिसमें मप्र के अजाक विभाग के एडिशनल डायरेक्टर सुरेंद्र भंडारी का उदाहरण भी पेश किया गया।
बिना योग्यता के पीएचडी में दिया प्रवेश : याचिका में अजाक विभाग के एडिशनल डायरेक्टर सुरेंद्र भंडारी का उदाहरण पेश करते हुए उन्हें भी पक्षकार बनाया गया। याची के अनुसार, श्री भंडारी का एनरोलमेंट, पीएचडी की डिग्री मिलने के मात्र 6 दिन पहले किया गया। जबकि, विश्वविद्यालय के आर्डिनेंस के अनुसार छात्र की उपस्थिति कम से कम 200 दिन की होनी चाहिए और इस मामले में उक्त नियम का पालन नहीं किया गया। शेष|पेज 11 पर
इन बिंदुओं पर होना है जांच
याचिकाकर्ता के एडवोकेट नितिन अग्रवाल के अनुसार आयोग उन्होंने जो उदाहरण दिए हैं उनमें गड़बड़ियों के आधार पर ही जांच करेगा, इसमें जेयू के आर्डिनेंस 7, 8 और 11 का पीएचडी प्रक्रिया में उल्लंघन की भी जांच की जाएगी। श्री अग्रवाल के अनुसार आर्डिनेंस 7 में पीएचडी में प्रवेश के लिए योग्यता, 8 में एनरोलमेंट संबंधी प्रक्रिया और आर्डिनेंस 11 में पीएचडी के दौरान 200 दिन की उपस्थिति के संबंध में प्रक्रिया का उल्लेख है।
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