ग्वालियर-
100 किलोमीटर तक पैदल पैदल चले डबरा पहुंचे । रास्ते में कई ट्रकों में बैठकर किया। मुरैना में आकर रुपए खत्म हो गए। खाने के लिए कुछ खरीदना मुश्किल हो गया, तब जाकर पत्नी के जेवर बेचने पड़े और कुछ रुपयों का इंतजाम हो सका। यह व्यथा है दिल्ली से परिवार के साथ झांसी जा रहे मजदूर रामखिलावन सिंह की।
दरअसल अभी भी कई मजदूर रुपए न होने के अभाव में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव के लिए जा रहे हैं। जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं। बावजूद इसके प्रशासन इन्हें घर तक पहुंचाने के लिए कोई मदद नहीं कर रहा है। मजदूरी मिल नहीं रही है, जिसके चलते वह वापस अपने गांव के लिए लौट रहे हैं। रविवार को दिल्ली व राजस्थान से पैदल चलकर कई मजदूर झांसी, सतना, छतरपुर के लिए जाते हुए दिखाई दिए। सिर पर गृहस्थी का बोझ, गोद में बच्चे लिए महिलाएं और पुरुष तपती धूप में पैदल सफर रहे हैं। छतरपुर जा रहे रामखिलावन सिंह दो बच्चे सरिता व राहुल के अलावा अपनी पत्नी दीपा को साथ लेकर दिल्ली से निकले तो रास्ते में ट्रक का किराया देते देते पूरे रुपए खर्च हो गए। इसके बाद पत्नी के जेवर तक बेचने पड़े। इस दौरान 100 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। वहीं सतना जा रहे गोविंद आदिवासी ने बताया कि वह राजस्थान के उदयपुर से पत्नी व बच्चों के साथ पैदल चलकर आ रहे हैं। शहरों में लोग जो खाना बांट रहे थे उसे खाया। जेब में रुपए भी नहीं है, इसलिए ट्रक वाले बैठा नहीं रहे हैं। घर पहुंच जाएं तो कुछ आराम मिलेगा
मजदूर को गहने बेचने पड़े, रुपए खत्म हुए ,तो सौ किमी तक चले पैदलमजदूर बोले- कभी ट्रक तो कभी पैदल चलकर कर रहे सफर तय
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