ग्वालियर- राजमाता विजयाराजे सिंधिया सरलता, सहजता और संवेदनशीलता की त्रिवेणी थीं। वे वात्सल्य की धनी थीं। वे ममतामयी थीं। राजमाता सिंधिया की 100वीं जयंती पर अनेक लोगों ने श्रद्धांजलि दी
डबरा से उनका जुड़ाव था लायंस क्लब और अन्य सामाजिक संथाओं में आती जाती थी हमारी भी श्रद्धांजलि ,
उन्हें एक बार जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की दृष्टि से 1972 में स्वयं अटलजी और आडवाणीजी उनके पास आए, राजमाता से दोनों नेताओं ने चर्चा की। राजमाता ने कहा कि मुझे एक दिन का समय चाहिए। राजमाता आध्यात्मिक भी थीं। वे दतिया पीताम्बरा पीठ गईं, अपने गुरु जी से चर्चा की और लौटीं तो उन्होंने अटलजी और आडवाणीजी से कहा कि वे भारतीय जनसंघ की सेवा एक कार्यकर्ता के रूप में सदैव करती रहेंगी।
राजमाता सिंधिया की 100वीं जयंती समारोह के मौके पर उनके जीवन से जुड़े संस्मरण
उन्हें पदों के प्रति कभी आकर्षण नहीं रहा। राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने भारतीय राजनीति में महिला के नाते देश में एक आदर्श कायम किया। उनकी राष्ट्रहित के प्रति जागरूकता ने ही उन्हें राजमाता से लोकमाता बनाया। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक उनकी यात्रा में उनेक उतार-चढ़ाव आए, पर उन्होंने अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण रहा उसे कभी नहीं छोड़ा।
उनका जन्म सागर के राणा परिवार में 12 अक्टूबर 1919 को हुआ। विवाह से पहले उनका लेखा दिव्येश्वरी था और उनकी शादी ग्वालियर राजघराने के अंतिम महाराज जीवाजीराव सिंधिया से हुआ। उनकी तीन बेटियां ऊषा राजे, वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया है। एकमात्र पुत्र स्व माधवराव सिंधिया भारतीय राजनीति में जानामाना नाम था।ग्वालियर महाराजा जीवाजीराव सिंधिया से विवाह के पश्चात पहली बार ग्वालियर आईं राजमाता विजयाराजे सिंधिया को कुछ तरह पर्देदारी में लाया गया।
जब डीपी मिश्रा सरकार गिराई
भारतीय राजनीति में उन्होंने मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा की सरकार को जब गिराया था और जनसंघ के विधायकों के समर्थन से स्व. गोविंद नारायण सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था, तभी से लोग राजनैतिक तौर पर राजमाता की ताकत का एहसास करने लगे थे।
उन्हें लोग राजमाता के नाम पर अवश्य जानते थे, पर जिस दिन उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की सरकार पलटी थी और गठबंधन की सरकार बनाई थी, उसी समय लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर लेंगी। हुआ भी यही और राजमाता ने जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की।
अटलजी और आडवाणीजी से चर्चा कर भारतीय जनसंघ की राजमाता से लोकमाता की ओर अग्रसर होने लगीं। उनका कुशाभाऊ ठाकरे से बहुत लगाव था। वे उन्हें पुत्रवत मानती थीं। उन्होंने बिना कुशाभाऊ ठाकरे से पूछे कभी कोई राजनैतिक निर्णय नहीं लिया। कुशाभाऊ ठाकरे भी उनका बहुत सम्मान करते थे।
माधवराव और कालूखेड़ा को जनसंघ से लड़ाया
राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र स्व. माधवराव सिंधिया और राजमाता के तत्कालीन सहयोगी स्व. महेन्द्र सिंह कालूखेडा, दोनों ही जनसंघ से चुनाव लड़े। राजमाता ने स्व. माधवराव सिंधिया को पहली बार सांसद का चुनाव भारतीय जनसंघ से लड़ाया और वे भारतीय जनसंघ के सांसद बने। इसी तरह महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा भी जनसंघ से ही निर्वाचित हुए।
गांव-गांव तक पहुंचाया जनसंघ
राजमाता जनसंघ की नेता के नाते पूरे देश में उनका अखंड दौरा प्रारम्भ हुआ। भारतीय जनसंघ को एक सशक्त महिला नेत्री मिली। राजमाता पूरी तरह अपने चुनाव चिह्न दीए को लेकर गांव-गांव पहुंचने लगीं। भारतीय जनसंघ की वैचारिक पृष्ठभूमि तेजी से तैयार होने लगी। इस बीच देश में स्व. इंदिराजी ने आपातकाल लगा दिया।
इस दौरान राजमाता’ को इंदिराजी ने बुलाया और कहा कि आप बीस सूत्रीय का समर्थन करें। इंदिराजी की इस बात पर राजमाता उनके सामने खड़ी हो गईं, उन्होंने इंदिरा जी से साफ तौर कहा कि मैं” जीवन में कांग्रेस के बीस सूत्रीय का समर्थन नहीं करूंगी। आप इंदिराजी चाहे जो करें। मैं जनसंघ की विचारधारा को नहीं छोडूंगी।”
राजमाता ने आगे कहा कि मैं जेल जाना पसंद करूंगी-लेकिन आपातकाल जैसे काले कानून का कभी समर्थन नहीं करूंगी। विचारधारा के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता और समर्पण ही देश में और दल में उन्हें रातों रात ऊंचाई पर ले गयी। धीरे-धीरे उनका संपर्क अनेक वरिष्ठ लोगों से होने लगा।
रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ चुनाव लड़ीं
1980 में राजमाता को जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने आग्रह किया कि वे” स्व. इंदिरा गांधी के विरुद्ध जनता पार्टी की ओर से रायबरेली से लोकसभा चुनाव लड़ें। राजमाता ने कहा कि जो पार्टी तय करे। राजमाता रायबरेली गईं और स्व. इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ीं। वे पीछे नहीं हटीं। वे चुनाव हार गईं। लेकिन उन्होंने संगठन के निर्णय को बिना किसी विरोध के शिरोधार्य किया। संगठन निष्ठ होने को यह अनुपम उदाहरण है।
भाजपा का झंडा लेकर थाने के बाहर पहुंची
एक बार प्रख्यात वकील श्री राम जेठमलानी के मुकदमे में ग्वालियर हाईकोर्ट आए। उनके आगमन पर कांग्रेस के लोगों ने उन पर पथराव किया। जेठमलानी के सिर में चोट आयी। उस समय राम जेठमलानी भाजपा में थे। राजमाता को जब ज्ञात हुआ तो वे भाजपा का झंडा लेकर स्वयं ग्वालियर के इंदरगंज थाने में हजारों कार्यकर्ताओं के साथ पहुंचीं और रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्होंने अपने ऊपर कभी भी राजघराने या राजशाही को हावी नहीं होने दिया। वे राजमाता होते हुए सदैव लोकमाता के मार्ग पर चलीं। यही कारण है कि देश ने उन्हें लोकमाता के रूप में स्वीकार किया।
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