ग्वालियर-अंचल में तैयार हो रहे सिंथेटिक दूध को खपाने के लिए हाइड्रोजन परॉक्साइड कैमिकल का उपयोग हो रहा है। इस कैमिकल का उपयोग मिलावटखोर दो कारणों से कर रहे हैं। जिसमें पहला कारण दूध को 8 से 10 घंटे तक खराब होने से बचाना होता है और दूसरा कारण है सिंथेटिक दूध में भी असली दूध जैसा झाग का आना। बीते दिनों ग्वालियर में महाराजपुरा के पास, शिवपुरी लिंक रोड और विक्की फैक्ट्री के पास ऐसा ही हजारों लीटर दूध चिलर टैंकरों से बहाकर नष्ट कराया गया है। भिंड, मालनपुर, गोहद, बानमौर, नूराबाद, मुरैना, जौरा आदि क्षेत्रों से शहर की खुली डेयरियों पर टंकी और चिलर टैंकरों से सिंथेटिक दूध की सप्लाई की जा रही है।
5.5 लाख लीटर की पूर्ति.. उपलब्धता 4 लाख लीटर से भी कम
1 फूड विभाग एवं दूध कारोबारियों के अनुसार ग्वालियर में रोजाना करीब साढ़े पांच लाख लीटर दूध की पूर्ति हो रही है। लेकिन वे खुद नहीं समझ पा रहे कि इतना दूध आ कहां से रहा है। क्योंकि, शहर के अंदर मौजूद करीब 800 दूध डेयरियों से 3 लाख लीटर दूध की पूर्ति हो रही है। जो कि 90 प्रतिशत तक घरों में सीधे सप्लाई होती है। वहीं और सांची, अमूल, मदर डेयरी से 65 हजार लीटर दूध की सप्लाई। ऐसे में बड़ा सवाल ये बना हुआ है कि डेढ़ लाख लीटर से अधिक दूध की पूर्ति कहां से हो रही है।
कार्रवाई से ऐसे बच रहे सिंथेटिक दूध बेचने वाले
जिला प्रशासन, फूड विभाग द्वारा जुलाई से मिलावटखोरों के खिलाफ अभियान शुरू किया गया और कई जगह कार्रवाई भी हो रही है। लेकिन ये टीम प्लांट स्तर पर कार्रवाई कर रही हैं। जबकि, बड़ी मात्रा में सिंथेटिक दूध शहरभर में खुली डेयरियों से खपाया जा रहा है। इन डेयरियों पर बसों में टंकी द्वारा, कहीं बाइक वाले दूधिए और कहीं चिलर टैंकरों से दूध पहुंचाया जा रहा है। इतने महीनों में प्रशासन की टीम ने ऐसी डेयरियों पर पहुंचकर कोई कार्रवाई नहीं की है।
2 सिंथेटिक दूध से ही पनीर, मावा और दही तैयार किए जा रहे हैं। इस दूध में यूरिया मिलाया जाता है इससे ये दूध जल्दी व अच्छा जम जाता है। वहीं पनीर बनाने के लिए इस दूध में सपरेटा दूध मिलाया जाता है। जिससे पनीर मुलायम हो जाता है। मावा के सिंथेटिक दूध ज्यादा उपयोगी माना जाता है। क्योंकि, सिंथेटिक दूध तैयार करने के लिए उपयोग किया हुआ रिफाइंड मिलाया जाता है और इसका मावा तैयार होने पर चिकनाहट देता है। लोग मावा की पहचान अच्छी चिकनाहट से ही करते हैं और ऐसे दूध के मावे में धोखा भी खा जाते हैं।
3 दूध को सुरक्षित रखने और झागदार बनाने के लिए मिलावटखोर हाइड्रोजन परॉक्साइड मिलाते हैं। ये कैमिकल दूध में डालते ही फटकर फैल जाता है और उसमें मौजूद बैक्टिरिया को ऑक्सीजन देकर मरने से रोकता है। साथ ही सुहागा भी डाला जाता है जो कि बैक्टिरिया को ज्यादा संख्या में नहीं बढ़ने देता। इन कैमिकल के उपयोग से दूध भी 8 से 10 घंटे तक बेकार नहीं होता। लेकिन ये कैमिकल लोगों को आंतों में अल्सर की घातक बीमारी देते हैं।
ऐसे करें घर पर दूध की जांच
एक हजार से पंद्रह सौ रुपए तक में मिलने वाली चैक किट दूध में यूरिया, कास्टिक, स्टार्च, हाइड्रोजन परॉक्साइड और मालटोस की मिलावट स्पष्ट करती है। कैमिकल जांच को लेकर अलग कलर दिए होते हैं जो मिलावट की पुष्टि करते हैं।
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