ग्वालियर
हम भारतीय दिल से भले ही कितने अच्छे हों, मगर दिल के रोग की चपेट में जल्दी आते जा रहे हैं। दिल के रोग इस कदर बढ़ते जा रहे हैं कि दुनिया में हार्ट डिसीज के मामले में हमारा क्रम तेजी से बढ़ने लगा है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि हृदय रोग की चपेट में 18-20 साल के युवा भी आते जा रहे हैं। यदि इस समस्या से हमें बचना है तो अपने दिल और दूसरों के दिल का ध्यान रखा जाए। ‘वर्ल्ड हार्ट डे’ की इस बार थीम भी ‘माय हार्ट, यूअर हार्ट’ ही है। कार्डियोलॉजिस्ट का मानना है कि शहर में कुल हार्ट पैशेंट्स में से 5 प्रतिशत मरीज 30 साल से कम उम्र के हैं।

sick man suffering from heart attack
एक्सपर्ट्स का कहना है कि गृहणियां कम घी-तेल वाला खाना बनाएं और जंकफूड बिल्कुल तो न बनाएं। माता-पिता खुद व्यायाम करने के साथ बच्चों को भी कराएं। ऑफिस में बॉस जागरूक करें कि कर्मचारी हर तीन घंटे में 15 मिनट का ब्रेक लेकर या तो पैदल चलें या फिर स्ट्रेचिंग करें।
‘नो यूअर नंबर’ के कांसेप्ट पर दें ध्यान
कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार देश में 40 की उम्र के बाद होने वाली मौतों में से 50 फीसदी मौत की वजह हृदय रोग ही है। भारत में एक हजार लोगों में से 11 हृदय रोगी हैं और यह संख्या बढ़ रही है। अपनी और अपनों की बेहतर सेहत के लिए ‘नो यूअर नंबर’ के कांसेप्ट पर ध्यान देना होगा। इसके तहत हमें अपने हाइट-वेट के अनुरूप बॉडी मास इंडेक्स, ब्लड प्रेशर, शुगर लेवल, लिपिड प्रोफाइल और हार्ट की पंपिंग क्षमता पर ध्यान देना होगा।
युवाओं में हार्ट डिसीज की बड़ी वजह तनाव
कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार हार्ट डिसीज पहले बढ़ती उम्र की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन अब यह कम उम्र में भी होने लगी। ऐसे में स्कूली दिनों से ही इसे लेकर जागरूक किया जाए है। शहर में कुल हृदय रोगियों में से 5 प्रतिशत 30 साल से कम उम्र हैं, जबकि 60 प्रतिशत 30 से 50 साल की उम्र के हैं। 30 साल से कम उम्र के मरीजों को हार्ट अटैक ज्यादा गंभीर आता है, क्योंकि उनके शरीर में हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली सहायक नसें विकसित नहीं हो पातीं। ऐसे में युवाओं को ज्यादा सचेत रहना चाहिए। युवाओं में हृदय रोग की वजह बिगड़ती लाइफ स्टाइल है। 40 वर्ष से कम उम्र के हार्ट डिसीज वाले रोगियों में से 90 प्रतिशत को तनाव के कारण हार्ट डिसीज हो रही है। इसमें से करीब 75 प्रतिशत से ज्यादा लोग कॅरियर को लेकर तनावग्रस्त रहते हैं, शेष पारिवारिक कारण से तनाव में हैं। यदि पैरेंट्स को हार्ट डिसीज है तो वे बच्चों को लेकर और भी जागरूक हो जाएं। इसके अलावा 30 साल की उम्र के बाद हर छह माह में अपना बीपी और शुगल लेवल चेक कराएं और बीएमआई 25 से कम रखें।
हृदय रोग के लक्षणों पर ध्यान दें
कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार यदि सीने, पीठ, कंधा, दोनों हाथों या जबड़े में दर्द हो, गले में घुटन महसूस हो, जो कार्य पहले आसानी से होते थे, उसे करने में सांस फूलने लगे, अचानक घबराहट होना, पसीना आना, चक्कर आए तो यह हृदय रोग के लक्षण हैं। इसके अलावा नियमित दिनचर्या में भी सीने में भारीपन होने लगे, थकान महसूस हो, सांस फूलने लगे तो चिकित्सकीय सलाह लें। दिल को सेहतमंद रखने के लिए सेहतमंद खाना, नियमित व्यायाम को दिनचर्या में शामिल करना होगा। इसके अलावा अल्कोहल, धूम्रपान, जंकफूड और तनाव से दूरी बनाने का प्रण लेना होगा। पैरेंट्स बच्चों को जंकफूड से दूर करें और मैदानी खेलों की ओर बढ़ाएं। आज भी ग्रामीण क्षेत्र में शहरी क्षेत्र की अपेक्षा हृदय रोग के मामले कम हैं।
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