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सिंधी समाज-सिंधी भाषा और संस्कृति को बचाने जून में लगेगा बाल संस्कार शिविर

ग्वालियर।
आधुनिकता के इस दौर में लोग अपनी प्राचीन भाषा, संस्कृति, भेषभूषा को भूलकर पश्चिमी संस्कृति को अपना रहे हैं। ऐसे में अपनी भाषा, संस्कृति, भेषभूषा को बचाने के लिए सिंधी समाज जून के प्रथम सप्ताह में बाल संस्कार शिविर का आयोजन करेगा। इस शिविर का उद्देश्य बच्चों को खेल-खेल में सिंधी भाषा, सिंधी संस्कारों की शिक्षा देना है। इस शिविर का आयोजन सिंधी समाज की महिलाओं द्वारा किया जाता है।
वर्तमान दौर में पश्चिमी सभ्यता लोगों पर हावी होती जा रही है। इसके कारण लोग अपनी सभ्यता संस्कृति और भाषा को भूलते जा रहे है। सिंधी समाज अपनी संस्कृति, पहनावा और भाषा को बचाने के लिए अनूठा प्रयास कर रहा है। इस प्रयास के तहत सिंधी समाज विगत दो साल से बाल संस्कार शिविर का आयोजन कर रहा है। पहले संस्कार शिविर में 60 बच्चों ने भाग लिया था जबकि दूसरे संस्कार शिविर में 80 बच्चे आए थे। इस संस्कार शिविर में बच्चों को खेल-खेल में सिंधी भाषा के शब्द सिखाएं जाते हैं। साथ ही उन्हें सिंधी परिधानों एवं भेषभूषा एवं भगवान के साथ सिंधी समाज की कहानियां भी सुनाई जाती हैं। इन कहानियों में 1947 का भी समावेश रहता है जब सिंधी समाज के लोगों को अपनी जान बचाने के लिए किस प्रकार बेघर होना पड़ा था।
नाना-नानी की कहानियों से देते हैं शिक्षा
सिंधी बाल संस्कार शिविर में बच्चों का मनोरंजन होता रहे साथ ही वह इस मनोरंजन में ही शिक्षा ग्रहण कर लें। इसके लिए उन्हें बाल संस्कार शिविर में शिक्षा देने वाली महिलाओं द्वारा जो कहानियां बचपन में अपने दादा-दादी, व नाना नानी से सुनी हैं। वहीं बताई जाती है। इसके साथ ही बच्चों को भगवान के बारे में भी बताया जाता है।
झूठ नहीं बोलो, बड़ों का करो सम्मान
बाल संस्कार शिविर में बच्चों के अंदर बचपन से ही झूठे नहीं बोलने व हमेशा सच का साथ देने के साथ माता पिता और बुजुर्गो सहित अपने से बड़ी उम्र के लोगों का सम्मान करने की शिक्षा दी जाती है । साथ ही यह भी सिखाया जाता है कि अगर हम किसी का दिल दुखाएंगे तो हम भी परेशान होंगे।
भगवान झूलेलाल के साथ माता और भगवान शिव की सुनाते हैं कथाएं
बाल संस्कार शिविर में बच्चों को धर्म के नजदीक लाने के लिए उन्हें भगवान झूलेलाल, सहित माता दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, सहित भगवान शिवशंकर, राम, श्रीकृष्ण सहित अन्य सभी भगवानों की कथाएं सुनाई जाती हैं। साथ ही इन क थाओं से क्या शिक्षा मिलती है यह भी बच्चों को बताया जाता है।
सिंधी समाज की पहचान है मेहनत
बच्चों को बाल संस्कार शिविर में यह सिखाया जाता है कि सिंधी समाज की पहचान मेहनत है। उन्हें बताया जाता है कि किस प्रकार उनके बुजुर्गों ने देश के बंटवारे के बाद अपना जीवनयापन करने के लिए साइकिल पर गोली, बिस्किट बेचते-बेचते आज बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित कर ली हैं। समाज के बुजुर्गों ने किस प्रकार परेशानी झेली और मेहनत कर आज समाज को देश के प्रतिष्ठित समाजों की लाइन में खड़ा किया है।
समाधिया कॉलोनी के विद्यालय में लगेगा शिविर
बाल संस्कार शिविर की कक्षाओं की शुरूआत समाधिया कॉलोनी स्थित भारतीय विद्या पीठ में हुई थी। इसके बाद से हर साल यहीं पर संस्कार शिविर को लगाया जा रहा है।
राजस्थान से मिली शिविर लगाने की शिक्षा
ग्वालियर में बाल संस्कार शिविर लगाने की शिक्षा सिंधी समाज को राजस्थान के बाल संस्कार शिविर से मिली। राजस्थान में बाल संस्कार शिविर को देखकर भारतीय सिंधी सभा की महिला शाखा ने शिविर लगाने का निर्णय लिया। राजस्थान में सिंधी समाज द्वारा हर शहर में चार से पांच संस्कार शिविर लगाए जाते हैं। पिछले वर्ष राजस्थान के बाल संस्कार शिविर में 1900 बच्चों ने भाग लिया था।
जून माह के प्रथम सप्ताह में बाल संस्कार शिविर का आयोजन किया जाएगा। इस शिविर में ज्यादा से ज्यादा बच्चे भाग लें इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। आज के समय में यह बाल संस्कार शिविर इसलिए भी जरूरी हैं। क्योंकि बच्चे सिंधी भाषा, संस्कृति और सभ्यता को भूलते जा रहे हैं।
भावना गुरुबक्शानी
जिलाध्यक्ष भारतीय सिंधु महासभा महिला शाखा
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