ग्वालियर-मुरैनामें बसपाई डॉक्टर रामलखन सिंह यूं तो लगभग डेढ़ माह पहले ही अपना टिकट फाइनल करवा लाए, लेकिन टिकट खींचने वाले हाथों की नब्ज पर पकड़ बरकरार नहीं रख पाए। नतीजा ये है कि प्रचार-प्रसार में सब कुछ लगाने के बाद अब टिकट बचाने की जुगत में ‘बहिन जी’ के दरबार में खाक छान रहे हैं। उधर भाजपाई नरेन्द्र सिंह तोमर का टिकट तो पहले ही चरण में फाइनल हो गया, लेकिन ‘भोपाल एक्सप्रेस’ पकड़ने के असमंजस में मुरैना में उनकी ‘प्रचार एक्सप्रेस’ जहां की तहां खड़ी रह गई।

मुरैना-श्योपुर संसदीय सीट पर इस बार यदि सबसे पहले किसी बड़ी पार्टी का टिकट तय हुआ है तो वह था भाजपा से बसपा में शामिल डॉ. रामलखन सिंह का। उन्हें बसपा सुप्रीमो ने पहले से ही तैयारी करने के लिए हरी झंडी दे दी थी। रामलखन सिंह ने डेढ़ माह के दौरान जमकर प्रचार किया। व्यक्तिगत संपर्क बढ़ाने के साथ-साथ चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ की जमावट भी दुरुस्त की। जब सब कुछ तय हो गया तो उनका टिकट कटने की नौबत बन गई। सूत्रों के अनुसार उन्हें टिकट बदले जाने की सूचना देकर दिल्ली बुला लिया गया था। उन्हें मैदान से हटाए जाने के बाद यहां करतार सिंह भडाना को टिकट मिलने के आसार बताए गए हैं
मुरैना पहुंचकर उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं के साथ बैठक भी की।
असमंजस में पीछे रहे
केन्द्रीय मंत्री व ग्वालियर सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर टिकट घोषित होने से पहले ग्वालियर व मुरैना से टिकट मिलने को लेकर असमंजस में रहे। मुरैना से जब तक टिकट फाइनल नहीं हुआ, वह ग्वालियर में तैयारी करते रहे। जब मुरैना में टिकट तय हुआ तो उनके भोपाल जाने के कयास लगने लगे। सूत्रों के अनुसार नरेन्द्र सिंह ने टिकट तय होने से पहले अपनी प्रथम वरीयता भोपाल, दूसरी वरीयता मुरैना को दी थी। यही कारण रहा कि 23 मार्च को टिकट घोषित होने के बावजूद वह मुरैना में लगकर प्रचार शुरू नहीं कर पाए। 13 अप्रैल को उन्होंने सबलगढ़, कैलारस और अंबाह में सभाएं लेकर कार्यालय का शुभारंभ किया।
टिकट में देरी से दिक्कत
कांग्रेसी राम निवास रावत का टिकट 5 अप्रैल को तय हो पाया। टिकट घोषित होने के बाद प्रचार शुरू करवा पाते, उससे पहले सिंधिया समर्थकों व दिग्विजय गुट में जमकर मारपीट हो गई। इस घटना के बाद से उनके प्रचार पर लगभग ग्रहण सा लगा हुआ है। अंबाह, पोरसा व एक दो जगह ही बैठकें कर पाए हैं। प्रचार के मामले में वह अन्य की तुलना में बहुत पीछे हो गए हैं। आगे की राह भी आसान नहीं है। कारण यह कि यहां दिग्गी गुट व सिंधिया गुट एक-दूसरे के साथ काम करने तैयार नहीं हैं।
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