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400 साल से गाया जा रहा फाग, 16 शृंगार कर महिलाएं करती हैंपरिक्रमा,60 साल से दूल्हा-दुल्हन बनकर शादी रचा रहे वृद्ध

ग्वालियर-
मुरैना होली का त्योहार यूं तो देश-दुनिया में हर जगह अलग-अलग रंग-ढंग से मनाया जाता है। लेकिन इस त्योहार को खास बनाती हैं लोक परंपराएं, जो देश, प्रदेश, क्षेत्र के हिसाब से कई रूपों में प्रचलित हैं। तीज-त्योहार की बात हो और बृज क्षेत्र में शामिल चंबल की धरती का जिक्र न हो यह तो संभव ही नहीं। फाल्गुन के माह में पड़ने वाला होली का त्योहार मुरैना में भी कई तरह से मनाया जाता है। जिले के रछेड़, शेखपुर और गोपालपुर गांव में ऐसी ही कुछ परंपराएं हैं जो कई साल से चल रही हैं।
रछेड़ में होती है फाग
बृज में हरि होरी मचाई, इतते आईं कुंवरि राधिका, उतते कुंवर कन्हाई…
5 हजार की आबादी वाले तंवरघार के गांव रछेड़ में 400 साल से फागोत्सव मनाया जा रहा है। इस आयोजन में होली की पड़वा के दिन बच्चे, बूढ़े और नौजवान एकत्रित होते हैं, फिर शुरू होता है गांव में फेरी लगाने का क्रम। हुरियारों की टोली गांवों के हर घर में जाकर बुजुर्गों को होली की बधाई देते हैं। वहीं घर के अन्य सदस्य इस टोली के साथ हो लेते हैं। गांव के शिवाकर सिंह तोमर बताते हैं कि गांव के जिन परिवारों में त्योहार से पहले किसी की मृत्यु हो गई होती है, वहां भी टोली के सदस्य पहुंचकर पीड़ित परिवार को संबल देते हैं। साथ ही नश्वर संसार से मनुष्य की विदाई सबकी तय है, यह बात फाग गीतों के माध्यम से बताई जाती है। अंत में पूरा गांव एकत्रित होकर फाग के रंग में रंग जाता है। यह क्रम पंचमी तक चलता है।
शेखपुर में ऐसी परंपरा
400 साल से होली पर 16 शृंगार कर गांव की परिक्रमा कर रहीं महिलाएं
कैलारस तहसील मुख्यालय से 9 किमी दूर है शेखपुर गांव। होली पर इस गांव में एक अजीब रिवाज है। गांव की महिलाएं सुबह उठकर सरोवर पर स्नान करती हैं। इसके बाद 16 शृंगार कर गांव की परिक्रमा करती हैं। इसके बाद खेली जाती है होली। परंपरा कितनी पुरानी है इसके स्पष्ट प्रमाण तो नहीं हैं लेकिन गांव के पूर्व सरपंच रामदीन त्यागी (80) साल बताते हैं कि हमारे दादा ने इस परंपरा के बारे में बताते हुए कहा था कि तकरीबन 400 वर्ष पूर्व गांव के रसूखदार लोगों ने अपने परिवार की महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी थी। तब गांव के संत विजयानंद बाबा ने यह परंपरा शुरू कर स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए यह रिवाज शुरू किया। तब से आज तक गांव की महिलाएं यह रस्म निभा रही हैं।
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