ग्वालियर-डबरा शहर के ओवरब्रिज इन दिनों जर्जर हालत में है। आवागमन को सुगम बनाने के लिए वर्ष 1986-87 में तत्कालीन मंत्री स्व. माधवराव सिंधिया ने क्षेत्रीय जनता की मांग पर डबरा-भितरवार मार्ग पर रेलवे ओवरब्रिज का निर्माण कार्य कराया था। तब से अब तक निरंतर ओवरब्रिज से हर रोज छोटे-बड़े हजारों वाहन गुजरते हैं। ओवरब्रिज के निर्माण के कई साल बीतने के बाद भी ब्रिज का मेंटेनेंस नहीं कराया गया है। जिसके चलते वर्तमान में ब्रिज पर गड्ढे हो गए हैं, जो कभी भी किसी बड़े हादसे की वजह बन सकते हैं।
ओवरब्रिज के निर्माण के बाद अब तक विगत कई सालों में ओवरब्रिज पर कई सड़क हादसे हो चुके हैं, जिसमें कई लोग अपनी जान भी गवां चुके हैं। वहीं विगत सालों में शहर का क्षेत्र बढ़ने के साथ यातायात का दबाव भी बढ़ा है। जिससे ओवरब्रिज से गुजरने वाले वाहनों की संख्या में भी बढ़ोतरी है। पुल से रोजाना काफी संख्या में भारी वाहनों के गुजरने से कई बार हादसे भी हो चुके हैं


और पुल की सड़क भी जर्जर हो गई है। सड़क में जगह-जगह हुए गड्ढों को लेकर शहर के समाजसेवी नगर पालिका और पीडब्ल्यूडी को अवगत करा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद मेंटेनेंस नहीं किया जा रहा है।
गड्ढों के बीच से निकलते हैं भारी वाहन
ओवरब्रिज का मेंटेनेंस नहीं होने से वर्तमान में सड़क पर जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं। ओवरब्रिज से रोजाना डबरा से भितरवार की ओर जाने वाले सैकड़ों भारी वाहन निकलते हैं, इसके अलावा भितरवार से डबरा व ग्वालियर जाने के लिए भी भारी वाहन गुजरते हैं। वहीं कृषि मंडी जाने के लिए किसान भी इसी मार्ग से गुजरते हैं। वर्तमान में ओवरब्रिज पर गड्ढे होने से दोपहिया वाहन चालक और भारी वाहन भी इनसे बचकर निकलते हैं। कई बार भारी वाहन गड्ढों से बचने के चक्कर में दुर्घटनाग्रस्त भी हो चुके हैं।
उखड़ी पड़ी है टाइल्स
रेलवे ब्रिज पर पैदल निकलने वाले लोगों के लिए फुटपाथ बनाया गया था सौंदर्यीकरण के लिए उस पर टाइल्स भी लगवाई गई थी, लेकिन जिम्मेदार अफसरों द्वारा मॉनिटरिंग नहीं करने के कारण जगह-जगह पर टाइल्स टूटी पड़ी हैं। जिन्हें अभी तक नहीं बदलवाया गया है।
इनका कहना है-
यह सही है कि ब्रिज का मेंटेनेंस समय-समय पर होना चाहिए, क्योंकि ऐसी चीजें बहुत मुश्किल में बनती हैं, इसलिए इनका रख-रखाव करना बेहद जरूरी है। रेलवे ओवरब्रिज के मेंटेनेंस का काम कौन देख रहा है। हमें पता नहीं है, क्योंकि ब्रिज को हमें हैंडओवर नहीं किया गया है।
मोहन सिंह जादौन, ईई सेतु विभाग ग्वालियर
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