ग्वालियर –
संगीत सम्राट तानसेन के सम्मान में पिछले93 वर्षों से ग्वालियर में शास्त्रीय संगीत केक्षेत्र में देश का सर्वाधिक प्रतिष्ठित महोत्सवआयोजित हो रहा है।


पूर्वरंग गमक के साथ इसका आगाज होगाछह दिन तक ग्वालियर की आवोहवा में संगीतकी सुरलहरियां गूंजेंगी। तानसेन और राजारामचंद्र के बीच के मार्मिक संबद्धों परआधारित यह अतीत के झरोखे से यह रिपोर्टप्रस्तुत है।
कलाओं के महान आश्रयदाता बघेलखण्डके राजा रामचन्द्र की राजसभा में जब जलालखा कुर्ची ने तानसेन को ले जाने का शाहीफरमान सुनाया तो राजा रामचन्द्र बहुत दुखीहुए। तानसेन के वियोग की आशंका से उनकी
आंखों से बच्चों के समान अश्रुधारा बह उठी।मुगल बादशाह अकबर ने सेना के साथजलाल खां कुर्ची को तानसेन को लेने के लिएभेजा तो राजा रामचन्द्र तानसेन को सौंपने केलिए विवश हो गए।
तानसेन समारोह की अगवानी में जनसंपर्कविभाग के हितेंद्र सिंह भदौरिया ने डॉ. हरिहरनिवास द्विवेदी की पुस्तक के आधार परतानसेन की मार्मिक विदाई के बारे में विस्तारसे उल्लेखित किया कि तानसेन को सौंपने कीबात सुनकर राजा रामचन्द्र बच्चों के समान रोउठे। जैसे-तैसे समझा-बुझाकर तानसेन ने उन्हेंशांत किया। राजा रामचन्द्र ने बहुमूल्य वस्त्रतथा मणि-माणियों से जडि़त अलंकार भेंटकर तानसेन को एक चौडोल (विशेष प्रकारकी पालकी) में बिठाया और पूरे नगर में विदाईजुलूस निकाला। नगरवासी तानसेन को विदाकरने काफी दूर तक जुलूस केअंदाज में साथ में चले। मार्ग में
तानसेन को प्यास लगी और उन्होंनेअपनी चौडोल रूकवाई। तानसेन
देखते हैं कि स्वयं राजा रामचन्द्रउनके चौडोल की एक बल्ली कोकंधा दिए हुए हैं। राजा के तन पर नवस्त्र हैं और न पैरों में जूते। यहदृश्य देखकर तानसेन भाव-विह्वलहोकर रोने लगे। विदाई के ये मार्मिक
क्षण देखकर साथ में मौजूद सैनिकतक अपनी आंखों के आंसू नहीं रोकसके।राजा रामचन्द्र ने अपने दिल कोकठोर कर तानसेन से कहा कि हमारेयहां ऐसी रीति है कि जब किसीस्व:जन की मृत्यु हो जाती है तोउसके परिजन अस्थि विमान कोकंधा देते हैं। मुगल बादशाह नेआपको हमारे लिए मार ही डाला है।बमुश्किल अपनी आंखों से बह रही
अश्रुधारा को रोकते हुए तानसेनबोले राजन आपने मेरे लिए या – या कष्टनहीं सहे। मैं आपके इन उपकारों का बदलाचाहकर भी नहीं चुका सकता। पर मैं आजएक वचन देता हूँ कि जिस दाहिने हाथ सेआपको जुहार (प्रणाम) की है, उस दाहिने हाथसे मैं अब दूसरे किसी भी शसियत को जुहारनहीं करूंगा। यह सुनकर राजा रामचन्द्र नेतानसेन की ओर से नजरें फेर लीं और दु:खीहृदय से अपनी राजधानी की ओर गमन कियातो तानसेन ने आगरा की राह पकड़ी। तानसेनने अपने वचन को जीवन भर निभाया।
राजा रामचन्द्र का पड़ाव रूखसत हुआ,तब तानसेन ने राग बागेश्री चौताला में एकध्रुपद रचना का गायन किया। । राजा मानसिंह कीमृत्यु होने और उनके उत्तराधिकारी विक्रमादित्य से ग्वालियर का राज्याधिकार
छिन जाने के कारण वहां के संगीतज्ञों कीमंडली बिखरने लगी। उस परिस्थिति मेंतानसेन ग्वालियर से वृंदावन चले गए औरस्वामी हरिदास से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्तकी।
आगरा के शासक इब्राहिम ने तानसेन कोदरबार में आने का निमंत्रण भेजा। मगरतानसेन ने उस निमंत्रण को ठुकरा दिया। वेवैराग्य जैसा जीवन व्यतीत करने लगे। बाद मेंतानसेन राजा रामचन्द्र की सभा गाने लगे औरपूरे हिंदुस्तान में वियात हो गए। उनकी यातिसुनकर मुगल बादशाह ने तानसेन को अपनेदरबार में बुलाकर प्रतिष्ठित स्थान दिया।तानसेन जीवन पर्यन्त सम्राट अकबर केनवरत्नों में शामिल रहे
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