ग्वालियर- मप्र मेंडॉक्टरों का पहले से संकट है। स्वास्थ्य विभाग में पीएससी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) के लिए डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में गजराराजा मेडिकल कॉलेज की नौकरी से डॉक्टरों का मोह भंग होना सरकार के लिए बड़ा चिंता का कारण बन सकता है। पिछले 7 साल में 21 डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हैं। जबकि सरकार एक पीजी सीट पर करीब 1.10 करोड़ खर्च करती है, इसलिए डॉक्टर का नौकरी छोड़ना सरकार को काफी महंगा पड़ रहा है।
गजराराजा मेडिकल कॉलेज में हाल ही में डॉक्टरों की भर्तियां हुई हैं। इसके बाद मेडिकल कॉलेज को बड़ा झटका तब लगा, जब पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. समीर गुप्ता और डॉ. प्रकृति गोस्वामी ने इस्तीफा सौंप दिया। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आखिर 80 हजार के आसपास वेतन पाने वाले डॉक्टर क्यों पद से इस्तीफा दे रहे हैं। जब नईदुनिया ने इस्तीफा दे चुके कुछ डॉक्टरों से चर्चा की तो नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चिकित्सा शिक्षा विभाग में प्रमोशन की जटिल प्रक्रिया, संसाधनों के अभाव के साथ ही आगे बढ़ने की इच्छा इस्तीफा देने का प्रमुख कारण रही है।
गौरतलब है कि पीजी छात्र पढाई के साथ काम भी करते हैं। जबकि एमबीबीएस छात्रों पर होने वाला लाखों का खर्चा इससे अलग होता है।
प्रायवेट प्रैक्टिस को चुना
जयारोग्य अस्पताल अंचल का सबसे बड़ा अस्पताल है। रोजाना हजारों की संख्या में मरीज पहुंचते हैं, यहां काम करने वाले डॉक्टर को नाम और फेम दोनों मिलता है। इसलिए कुछ डॉक्टरों ने कुछ समय तो अस्पताल में सेवाएं दी, इसके बाद इस्तीफा देकर प्रायवेट अस्पताल या क्लीनिक खोल लिए हैं।
सरकार के प्रयासों को झटका
डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए केन्द्र सरकार ने सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बाद प्रति एक पीजी सीट के लिए कॉलेजों को 1.10 करोड़ तक दिए जा रहे हैं। हालांकि अधिकांश मेडिकल कॉलेज एमसीआई की शर्तों को पूरा नहीं कर सके, इसलिए कुछ कॉलेजों में पीजी सीट भी नहीं बढ़ सकी है।
प्रमोशन नीति में बदलाव
शासन को भी डॉक्टरों का मर्ज समझने में काफी समय लग गया। अब जाकर आदर्श भर्ती नियम तैयार किए गए, जिसके तहत डॉक्टरों को प्रमोट करके संतुष्ट करने का प्रयास किया गया। हालांकि अब इसमें शामिल प्रायवेट प्रैक्टिस प्रतिबंधित होने का नियम डॉक्टरों के रोष का कारण बना हुआ है, जिसके सभी मेडिकल टीचर्स विरोध कर रहे हैं।
स्पेशिलिटी पीडियाट्रिक सर्जन, बना दिया जनरल सर्जन
पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. समीर गुप्ता की स्पेशलिटी ही मेडिकल कॉलेज में मिट गई थी, अपनी विशेषता को हासिल करने के लिए उनको इस्तीफे का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। क्योंकि कॉलेज में उनको जनरल सर्जन बना दिया गया था। अब डॉ. गुप्ता एमसीआई से पत्र ले आए हैं और दोबारा सुपर स्पेशिलिटी में आवेदन करने की तैयारी में जुट गए हैं।
इन डॉक्टरों ने दिए इस्तीफे
सर्जरी विभागः डॉ अनिल गंगजी, डॉ. समीर गुप्ता, डॉ. विक्रम मुजाल्दे
मेडिसिन विभागः नवनीत अग्रवाल, अरविंद चौहान, डॉ. संदीप अहिरवार, डॉ. मनोज गुलाटी, डॉ. सुभलक्ष्मी मारगेकर
आर्थोपैडिक विभागः डॉ. आशीष शिर्षिकर, डॉ. शैलन्द्र सैयाम,
गायनिकः डॉ. स्वाति अग्रवाल, डॉ. श्वेता सिरसिकर, डॉ. प्रकृति गोस्वामी, एक अन्य।
पीएसएमः डॉ. प्रियेष मस्कोले, डॉ. राजेश सिंगरौले(अन्य विभाग)
पैथोलॉजीः डॉ. अनिल मीणा
बायो कैमिस्ट्रीः डॉ. तरुण शर्मा
चेस्ट एंड टीबीः डॉ. दीपक चौपड़ा
स्कीन रोग विभागः डॉ. खुजेमो सैफी
पीडियाट्रिक्सः डॉ गुणवंत इस्के
जीआर मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ भरत जैन से सीधी बातः
सवालः डॉक्टरों का मेडिकल कॉलेज से मोहभंग होने का कारण क्या मानते हैं?
जवाबः मैने देखा है, सभी ने व्यक्तिगत कारण ही बताए हैं। यदि किसी ने वर्किंग कंडिशन को लेकर कारण बताया होता तो हम भी समझाते।
सवालः समय पर प्रमोशन और संसाधन का आभाव भी क्या कारण है?
जवाबः पहले प्रक्रिया जटिल थी, मगर अब तो हम सह, सहायक और प्रोफेसर के पदों पर भर्ती कर सकते हैं। किसी प्रकार की कोई दिक्कत ही नहीं है, प्रमोशन भी सभी के हुए हैं। यदि संसाधन की दिक्कत है तो दूर की जाएगी, मगर इसके लिए विभागों को बताना तो होगा।
सवालः पीजी सीट पर 1.10 करोड़ सरकार देती है, डॉक्टरों के नौकरी छोड़ने को बड़ा नुकसान नहीं मानते?
जवाबः पीजी सीट पर इंसेटिंव दिया जाता है। वह तो नौकरी भी करते हैं। एमबीबीएस स्टूडेन्ट पर जरूर सरकार का खर्च होता है। पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचर्स की फीस आदि खर्च शामिल होता है। डॉक्टरों के प्रोफेशन में आवागमन चलता रहता है, इसमें कोई नई बात नहीं है।
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