ग्वालियर –
पत्रकारिता को देखने के दो तरीके हो सकते हैं। पहला ऊपर से नीचे और दूसरा नीचे से ऊपर। कई लोगों का मत है कि पत्रकारिता पर कॉर्पोरेट कल्चर हावी हो गया है, मैं इससे सहमत नहीं हूं। आज भी कई पत्रकार और संपादक हैं जो सच छापने का दम रखते हैं। इसकी झलक आप ग्रामीण क्षेत्र की पत्रकारिता में देख सकते हैं। देश में कई छोटे-छोटे स्व: सहायता समूह हैं, जो बैंक की बिना सहायता के चल रहे हैं। ठीक उसी तरह छोटी-छोटी जगहों पर छोटे-छोटे पत्रकारों ने इस पत्रकारिता और लोकतंत्र को जिंदा बनाए रखा है। यह बात वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कही।

वह आईटीएम यूनिवर्सिटी में आयोजित एडिटर्स कॉन्क्लेव में बोल रहे थे। यह कॉन्क्लेव दो सत्रों में हुई। पहले सत्र का विषय संकुचित सूचना संचार-सिमटता लोकतंत्र था। आधार वक्तव्य यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर रमाशंकर सिंह का रहा।
आज भी भी पत्रकारों ने लोकतंत्र और पत्रकारिता को जिंदा रखा है
सच्चाई उजागर करने पर नहीं मिलता साथ
वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केशवानी ने कहा कि बात सूचना की है तो इसमें सोशल मीडिया जुड़ गया है। सच को झूठ और झूठ को सच की तरह पेश किया जा रह ाहै। एक दुर्भाग्य यह भी है कि जब कोई पत्रकार सच्चाई उजागर करता है, तब उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता।
असहमति का सम्मान करना लोकतंत्र की शर्त
पत्रकार अभय दुबे ने कहा कि आज सरकार के पास 3 नॉन 3 है, यानी 303 का बहुमत। वह इसकी दम पर काम करना चाहते हैं। लोकतंत्र की 3 बातें बताना जरूरी हैं। पहली, विपक्ष के साथ अच्छा सुलूक करना, दूसरी असहमति का सम्मान करना तीसरी आलोचनात्मक दृष्टि का सम्मान।
सूचनाएं व्यक्ति को सशक्त बनाती हैं
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने कहा कि सूचनाएं व्यक्ति को सशक्त बनाती हैं। दूसरे सत्र में पत्रकार नवीन कुमार ने कहा कि सियासी दुनिया ने हमें मेले में खड़ा कर दिया है। जहां से हम सिर्फ यहां होती घटनाओं को देख सकते हैं। इस मौके पर पत्रकार अजीत अंजुम, सुशील पंडित, चंद्र भूषण ने विचार रखे।
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