ग्वालियर-
प्रदेश में चली बदलाव की बयार में विपरीत परिणाम आना कोई हैरानी की बात नहीं है, लेकिन पार्टी का गढ़ बने ग्वालियर में भाजपा की जो स्थिति बनी है,वो कहीं न कहीं ओवर कॉन्फीडेंस का नतीजा है। दरअसल कहीं न कहीं भाजपाई दिग्गज टिकट को ही विधायकी की गारंटी मानकर सुस्त चाल बने रहे। जब तक हवा में बदलाव का अहसास हो पाता,तब तक मतदाताओं का आक्रोश ईवीएम में कैद हो चुका था।
प्रदेश में लगातार तीन बार से काबिज भाजपा इस बार भी फील गुड थी। अबकी बार 200 पार का नारा ऐसे बुलंद किया जा रहा था,मानों भाजपा को ही तय करना है कि उसे कितनी सीटों पर जीतना है। जनता जनार्दन तो उन्हें जिताने को आतुर बैठी है। खासकर चुनावी डुगडुगी पिटने से पहले जिस तरह योजनाओं का पिटारा खोला गया,उसे लेकर भाजपाई मान बैठे थे कि कि अब कहीं कोई खतरा नहीं है। हर मुद्दे को अपनी सुविधानुसार अपने समर्थन में मान लेना भाजपा के लिए बड़ा संकट बन गया।
अड़कर लिया था सतीश ने टिकट
ग्वालियर पूर्व सीट पर मूल रूप से मौजूदा विधायक व मंत्री माया सिंह का दावा था। वहीं सतीश ने विभिन्न माध्यमों से यह जग जाहिर कर दिया था कि यदि उन्हें टिकट नहीं मिला तो वह बगावत कर देंगे। टिकट पाने की उनकी लालसा, इस हद तक थी कि उनके भाई सुमावली विधायक ने इस बार अपना दावा वापस ले लिया था। पार्टी नेताओं को भी लगा कि कहीं सतीश की बगावत से भाजपा के कब्जे में रहने वाली ग्वालियर पूर्व सीट हाथ से न निकल जाए। लेकिन जो परिणाम आए उससे साफ जाहिर हो गया कि सतीश टिकट पाने जैसा दमखम जीत में नहीं लगा सके।
बगावत और डैमेज कंट्रोल असफल
ग्वालियर व ग्वालियर पूर्व सीट पर जीत-हार को जो समीकरण सामने आए, उससे साफ जाहिर है कि जमकर भितरघात हुआ है। ग्वालियर पूर्व सीट पर टिकट के दावेदार और सवर्ण समाज की वकालत करने वाले जय सिंह, टिकट न मिलने से खफा होकर पहले घर बैठ गए। बाद में उन्हें डबरा पहुंचा दिया गया।
डबरा में भी यहीस्थित रही बाहरी चर्चित प्रत्याशी कप्तानसिंह परिहार ग्राम सहसारी को स्थानीय विरोध के बावजूद टिकिट मिलना गलत हुआ,टिकिट की घोषणा पर पहले ही दिन हार तय हो गई थी डबरा में कार्यकर्ताओं की बातों शिकायतों को नजर अंदाज किया गया कप्तान सिंह की लंबे समयसे शिकायते हो रही थी , जिला अध्यछ से अनबन की भी खबरे थी वजनदार स्थानीय नेता नहीं चाहते की भाजपा जीते ,
हम नहीं तो कोई नहीं ,
कार्यकर्ताओ के काम सासद के प्रतिनिधि सही नहीं कर पा रहे थे इससे भी फर्क पड़ा तहसील,एसडीएम , कलेक्टर, पुलिस थानों बिजली विभाग में कई काम पड़ते कोई सुनवाई नहीं अधिकारी मनमानी करते थे, जनता लुट रही थी, रेत बजरी पर कोई कंट्रोल नहीं वसूली कुछ पुराने नेता कर रहे थे
यही स्थिति माया सिंह की रही। टिकट कटने के तरीके से नाराज माया सिंह और उनकी पूरी टीम पूरे चुनावी परिदृष्य से गायब रही। अंदरखाने की खबरों के मुताबिक सतीश सिंह को यह टिकट केन्द्रीय मंत्री की सहर्ष स्वीकृति से नहीं मिला था। नतीजा यह हुआ कि सीट पार्टी के हाथ से न केवल फिसल गई, वरन हार भी बड़े अंतर के साथ हुई।
ग्वालियर सीट पर जयभान सिंह पवैया को पार्टी का एक धड़ा शुरुआत से हासिए पर लाने में लगा हुआ था। उन्हें मंत्री पद भी तीन साल की विधायकी के बाद संघ के दबाव में मिल पाया था। चुनाव के दौरान कांग्रेसी प्रद्युम्न जितने सक्रिय अपनी जीत के लिए थे, लगभग उतनी ही सक्रियता से भाजपाई जयभान सिंह पवैया को हरवाने में लगे थे।
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