बढ़ता कारवाँ/सिंगरौली/ब्यरो कार्यालय/वैढ़न,सिंगरौली। दीपावली का खुशनुमा मौसम आ गया है। जनता धन की लक्ष्मी की पूजा की तैयारी में है। अंधकार से प्रकाश की ओर कदम बढ़ रहे हैं। अपने-अपने घरों को आलौकिक करने तथ सजाने के लिए सफाई अभियान चल रहा है ताकि लक्ष्मी जी रूठ न जायें वो हमारे गृह में प्रवेश करके स्थायित्व से रहें। आम जनता से इतर कुछ तत्व समाज में ऐसे भी हैं जो धन की लक्ष्मी पर बाजी लगाकर उन्हें जीतना चाहते हैं। उर्ती के घनघोर जंगलों में यही बाजी लगायी जा रही है।

दीपावली पर लक्ष्मी को प्राप्त करने, उन्हें जगाने की इस फेहरिस्त में उर्ती के जंगल में मंगल मनाया जा रहा है। धन को प्राप्त करने का अवैधानिक तरीका अपनाय जा रहा है। उर्ती का जंगल इन दिनों ताश के ५२ पत्तों की सरसराहट से गूंज रहा है। दूर-दूर से खिलाड़ी आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि स्थानों से जुआरी जंगल की राह पकड़ रहे हैं। दिन में ११ बजे से बिशात सज जाती है। लगभग एक सैकड़ा खिलाड़ी जम जाते हैं और पूरे दिन लाखों के वारा न्यारा का सिलसिला चलता रहता है। सुविज्ञ सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार तीन नामचीन लोग हैं जो जुअें की इस बिशात को प्रतिदिन अंजाम देने के लिए प्रबंधन का काम करते हैं। इन्हें इनके कोड भाषा में ‘बुकÓ कहा जाता है। जो बाजी बिछती है उसमें एक तरफ सामान्य खिलाड़ी होते हैं तो दूसरी तरफ जमात में ही बुक वाले भी बैठते हैं। सूत्रों की मानें तो बुक वाले खिलाड़ी दस लाख रूपये तक लेकर बैठते हैं। फड़ पर जो पैसा दाँव पर लगता है यदि बुक के तीन खिलाड़ियों में से कोई जीता तो सारा पैसा तीन खिलाड़ियों में बांट दिया जाता है। यदि दाँव पर दस लाख लगे तो तीन खिलाड़ियों में तीन तीन लाख बराबर बांट दिया जाता है और एक लाख सुविधा शुल्क के लिए भेज दिया जाता है। जिस दीपावली में लोग धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करके उन्हें स्थायी रूप से अपने गृह में आसन देने की मन्नत करते हैं उसी दीपावली में समाज के चन्द धन लोलुपों द्वारा लोगों के घर का दीवाला निकाला निकाला जाता है। पता तो यहां तक चला है कि हार जाने वाले खिलाड़ियों को फाइनेंस करने के लिए भी वहां एक टीम रहती है। दस प्रतिशत प्रतिदिन के ब्याज पर तुरंत धन मुहैया कराया जाता है। जिन लोगों को यह फाइनेंसर पैसा नहीं देते वे अपने वाहनों को गिरवी रखकर बाजार से पैसा प्राप्त करते हंै और फिर हार जाने के बाद बड़ी-बड़ी रकम के कर्जदार बन जाते हैं। जुअें का यह नशा इस पावन पर्व के अवसर पर बहुतों के घरों को बर्बाद कर रहा है।
जुअें में सबकुछ हार जाने की गाथाएं इतिहास में भरी पड़ी हैं। पाण्डवों ने युधिष्टिर के इस शौक के कारण कहाँ-कहाँ की ठोकर खायी थी। सोनभद्र के अगोरी के किले का राजा मूलागत अपने ही गांव के एक युवक मेहरा यादव से जुअे की बाजी में अपना सारा राजपाठ हार गया था। फिर उसी रियासत में दूसरी बार जुआं होने पर वह युवक मेहरा यादव राजा से सबकुछ हार गया, यहां तक कि अपनी पत्नी के गर्भ में पल रही संतान को भी दाँव पर लगाकर हार गया। यह होता है जुअे की लत का हश्र, जिम्मेदार लोगों को इस समस्या के लिए सार्थक चिंतन करके उचित पहल करनी चाहिए।
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