ग्वालियर – लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम में 29 साल पहले स्थापित किए गए पौने दो करोड़ की लागत के विद्युत शवदाह गृह की कोरोना ने फिर सूरत बदल दी है। अब वहां न केवल कोरोना पीड़ितों की अंत्येष्टि की जा रही है बल्कि सामान्य मौत पर भी लोग उसका उपयोग करने लगे हैं। पिछले एक पखवाड़े में इस तरह के 11 शवों की अंत्येष्टि इसी विद्युत शवदाहगृह में की जा चुकी है। लोगों की बदली सोच को देखते हुए नगर निगम प्रशासन ने अब उसके रखरखाव पर ज्यादा फोकस करना शुरू कर दिया है।
पर्यावरण सुरक्षा और लावारिश शवों की दुर्दशा
पेड़ों को बचाने और लावारिश शवों की दुर्दशा को ध्यान में रख नगर निगम प्रशासन ने 1988 में विद्युत शवदाह गृह स्थापित करने का संकल्प पारित किया था। दो साल बाद 1990 में 80 लाख का स्ट्रक्चर और इतनी ही लागत की मशीनरी स्थापित की गई थी। एक साल तक इसका उपयोग किया गया लेकिन लोगों को उसमें अंत्येष्टि करना रास नहीं आया। जिससे उसमें केवल लावारिश शवों की ही अंत्येष्टि की गई। लेकिन मुक्तिधाम के सफाई कर्मचारियों और लकड़ी विक्रेताओं के विरोध के चलते उसे बंद करना पड़ा।
2010 में समिति को दिया
लंबे समय तक बंद रहने के बाद 2010 में उसे स्वयंसेवी संस्था रेडक्रॉस सोसायटी ने लिया। लेकिन विरोध के कारण यह संस्था भी उसे लंबे समय तक नहीं चला सकी और 2012 में हाथ खींच लिए। तभी से वह बंद था और उसका रखरखाव भी मुश्किल था। मशीन का 24 घंटे तापमान 600 डिग्री रखना पड़ता है। इसलिए ट्रांसफार्मर भी लगाना पड़ा था।
कोरोना ने बदली सोच
अब कोरोना संकट में उसकी उपयोगिता फिर साबित हुई। कोरोना पीड़ितों की अंत्येष्टि के लिए विद्युत शवदाह गृह सबसे सुरक्षित है। क्योंकि इसमें मुश्किल से 15 मिनट में अंत्येष्टि हो जाती है और आधा घंटे में परिजनों को फूल भी मिल जाते हैं। सामान्य मौत होने पर कोरोना के भय और सरकारी गाइड लाइन के कारण अंत्येष्टि में कम लोग ही मुक्तिधाम पहुंच रहे हैं। इसलिए लोग उसी में अंत्येष्टि करने लगे हैं। इसमें समय और कम से कम 5-6 हजार रुपये का खर्च भी बच रहा है। अब तक कोरोना पीड़ित 5 व सामान्य मौत पर 11 शवों की अंत्येष्टि हो चुकी है। इसे देखते हुए निगम प्रशासन अब मशीन का मेंटेनेंस करने की तैयारी में है।
इनका कहना है
विद्युत शवदाह गृह का उपयोग सामान्य मौत पर परिजन करने लगे हैं। अब तक ऐसे 11 शवों की अंत्येष्टि मशीन में हुई है। लोगों की सोच बदली है, यह अच्छी बात है। इससे न केवल समय बल्कि पर्यावरण भी बचेगा।
डॉ. अतिबल सिंह यादव, उपायुक्त विद्युत विभाग ननि
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