ग्वालियर-
डबरा शुगर मिल में उत्पादन बंद होने के बाद अब दि-ग्वालियर शुगर कंपनी की मशीनें भी कट कर बिकने लगी हैं। मशीनें बिकने के कारण मिल के फिर से शुरू होने की उम्मीद लगा रहे कर्मचारी और अंचल के किसानों की उम्मीद भी खत्म हो चुकी है और इसके साथ ही जिस शुगर फैक्ट्री के कारण नगर बसा और अंचल को एशिया भर में पहचान मिली वह भी अब खत्म हो रही है। लोगों का कहना है कि शहर को पहचान और रोजगार देने वाली इस फैक्ट्री को बचाने के लिए अंचल के किसी भी जनप्रतिनिधि या अफसर ने कोई प्रयास नहीं किए, जबकि यहां के स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में पहले भाजपा और अब कांग्रेस सरकार में मंत्री है।
गौरतलब है कि वर्ष 2012 मई से डबरा शुगर फैक्ट्री में उत्पादन होना बंद हो गया था। उत्पादन बंद होने के बाद इस मिल में काम कर रहे कर्मचारियों को रोजगार के लिए और अंचल के किसानों को गन्ना बेचने के लिए मिल प्रबंधन पर बकाया होने के बाद भी मिल शुरू होने की उम्मीद थी। लेकिन अब उनकी यह उम्मीद खत्म हो चुकी है। मिल प्रबंधन द्वारा मिल की मशीनों बेच दिया गया है और अधिकांश मशीन मिल से निकाल जा चुकी है। इसके साथ मिल का स्ट्रक्चर भी खत्म किया जा रहा है।
इसी शुगर फैक्टरी के कारण डबरा की देशभर में बनी थी पहचान
डबरा शुगर मिल की मशीनें काटकर बेंची जा रही हैं, इन्हें ट्रकों में लादकर भेजा जा रहा है।
वर्ष 1940 में स्थापना, उत्पादन 1941-42 में किया शुरू
डबरा में शुगर मिल की स्थापना के बाद ही डबरा को एक नई पहचान मिली। इस शुगर फैक्ट्री का निर्माण कार्य 16 अगस्त 1940 को किया गया था और वर्ष 1941-42 में मिल मे शक्कर बनाने का कार्य प्रारम्भ हो गया था। शुगर मिल के प्रथम संस्थापक सर जेपी श्रीवास्तव थे और उन्हीं के प्रयासों से डबरा में शुगर मिल की स्थापना की जा सकी। साथ ही इस शुगर मिल की स्थापना में हालैण्ड निवासी जनरल डीएच डायफ की भी महती भूमिका रही। शुगर मिल की स्थापना के साथ डबरा का विकास भी प्रारम्भ हो गया और देखते ही देखते डबरा एक शहर का रूप लेने लगा। मिल स्थापना के बाद 1944 में डबरा के तीव्र विकास को देखते हुए डबरा में नगर पालिका कि स्थापना की गई। नगर पालिका स्थापना का एक मुख्य कारण शुगर मिल थी, यही कारण रहा कि शुगर मिल के जनरल मैनेजर डीएच डायफ को नगर पालिका का निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया। नगर पालिका की स्थापना के साथ ही निकटवर्ती पिछोर से हटाकर तहसील मुख्यालय भी डबरा को बनाया गया।
डबरा शहर जिस शुगर मिल की बदोलत बसा उसका अस्तिव बचाने सामने नहीं आ रहा कोई भी जनप्रतिनिधि, अधिकारी
वर्ष 1940 में नपा के प्रथम अध्यक्ष हॉलैंड निवासी जनरल डायफ ने खोली थी फैक्टरी
1 हजार कर्मी कार्यरत थे, दतिया से आते थे किसान
जब शुगर मिल की स्थापना हुई थी उस दौरान मिल में करीब 1 हजार से अधिक कर्मचारी काम करते थे और उत्पादन बंद होने तक करीब 500 कर्मचारी कार्यरत थे। इसके साथ ही डबरा और भितरवार अंचल के साथ ही दतिया और बाहरी क्षेत्र से भी काफी संख्या में किसान अपना गन्ना देने मिल को आते थे, जिसके कारण बाजार भी चलता था और लोगों को रोजगार मिलता था।
अाधिकारिक रूप से बंद नहीं की गई है शुगर फैक्टरी
 अभी फैक्ट्री को आधिकारिक रूप से बंद नहीं किया है। वर्ष 1998 से फैक्ट्री घाटे में चल रही थी। किसानों और कर्मचारियों की देनदारियां निपटाने के लिए मशीनें बेची गई हैं।  जीतेंद्र सिंह कुशवाह, ओएसडी, दि ग्वालियर शुगर कंपनी लिमिटेड
जनप्रतिनिधियों ने नहीं किए मिल बचाने प्रयास
क्षेत्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया, यशोधरा सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर जैसे कद्दावर जनप्रतिनिधि और सांसद रह चुके हैं। इसके साथ ही शहर में जन्में भाजपा के कद्दावर नेता और तीन बार प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके नरोत्तम मिश्रा ने भी इस मिल के बंद होने के बाद शुरू कराए जाने को लेकर प्रयास नहीं किए। इसके साथ वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री और स्थानीय विधायक इमरती देवी और भितरवार विधायक और मंत्री लाखन सिंह यादव ने भी मिल को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए। यदि मिल शुरू रहती तो आज अंचल के कई लोगों को रोजगार मिलता और क्षेत्र का विकास होता।
शुगर फैक्टरी के अस्तित्व को बचाया जाना जरूरी
 शुगर मिल के कारण ही नगर बसा था,इसी मिल के कारण नगर की पहचान एशिया भर में थी। मिल के कारण लोगों को काफी रोजगार मिलता था। लेकिन अब मिल बंद हो गया है। किसी भी जनप्रतिनिधि ने मिल को बंद होने से बचाने के लिए किसी प्रकार के प्रयास नहीं किए।  रामानंद गुप्ता, सराफा बाजार,डबरा
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