ग्वालियर
देश के संभवतः एक मात्र हरिजन गुरूद्वारा प्रांगण में रविवार को गोगा जाहरसिंह का मेला लगा। मेले में मुरार क्षेत्र के पहले विजय पताकाओं का स्वागत कर उन्हें उठाने वाले भक्तों का सम्मान किया गया। हरिजन गुरूद्वारे में ग्रंथसाहिब का पाठ के साथ गुरूनानक देव महाराजजी की शंख, झल्लर और घण्टों की शुभध्वनि में आरती की जाती है। गुरूद्वारे में पूजा पाठ सहित सभी धार्मिक कार्य वैदिक रीतिरिवाज के साथ चार पीढ़ियों से वाल्मिकी समाज के लोग करते आ रहे हैं।
क्षत्रिय राजा गोगादेव जाहर सिंह चौहान द्वारा बाल्मीक सेनापति रतनसिंह के पिता श्यामसिंह को दी गई विजय पताका को लेकर मुरार क्षेत्र के भक्त हरिजन गुरूद्वारे पहुंचे। यहां पर लगभग 80 सालों से गोगादेव के मेले की परम्परा चली आ रही है । मेले में जब सभी विजय पताकाएं (नेजे) आ जाते हैं उसके बाद भजनों का आयोजन किया जाता है। यह भजन समाज के घरानों द्वारा गाए जाते हैं। इनमें गोगा जाहरसिंह और उनके सेनापति सहित अन्य वीर सेनानियों की वीरगाथाएं होती हैं। इन भजनों में सभी गोगा जाहरसिंह चौहान की सभी युद्वों की गाथाएं गाई जाती हैं। यह लोकगीत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्हीं मेलों के माध्यम से पिछले 1000 सालों से पहुंचाए जाते रहे हैं।
यह है हरिजन गुरूद्वारे के स्थापना की कहानी
मुरार स्थित खटीक मोहल्ले के पास गुरूद्वारा चौक है। यहां पर 8 दिसंबर 1927 को बाबा रतनसिंह ने कहने पर बाल्मिकी समाज के लोगों गुरूद्वारे की स्थापना की थी। गुरूद्वारे की देखरेख और सेवा करने वाले विधीचंद चौहान, और स्वरूपचंद चौहान ने बताया कि 1927 में ग्वालियर में संभवतः एक ही गुरूद्वारा था जो कि फूलबाग पर था। ग्वालियर में एक बार बाबा रतनसिंह का आना हुआ। वह घूमते हुए हमारे परदादा छोटेलाल चौहान के पास आए। उन्होंने हमारे परदादा से कहाकि गुरूद्वारे की स्थापना करनी है। इसके बाद हमारे परदादा छोटेलाल चौहान ने बाबा रतनसिंह के आदेश पर गुरूद्वारे की स्थापना की। इसके बाद से बाल्मिकी समाज ही गुरूद्वारे की देखरेख पूजा पाठ आदि सभी कार्य करते आ रहे हैं।

अमावस्या और पूर्णिमा पर होते हैं आयोजन
गुरूद्वारे पर गुरूनानक जयंती, अमावस्या और पूर्णिमा सहित बंसत पंचमी पर विशेष आयोजन किए जाते हैं। अमावस्या और पूर्णिमा पर प्रसाद चढ़ाते हैं साथ ही लंगर का भी आयोजन किया जाता है।
पगड़ी नहीं बांधते लेकिन मानते हैं सिखों के सारे नियम
विधिचंद चौहान ने बताया कि बाल्मिकी समाज के लोग केश नहीं बढाते हैं और ना ही सिर पर पगड़ी बांधते हैं। लेकिन सिख पंथ के सभी नियमों का पालन किया जाता है। गुरूद्वारा के अंदर सिर को ढककर जाते हैं। साथ ही वहां पर आने वाले सभी भक्त भी सिर को ढककर अंदर प्रवेश करते हैं।
सबसे पहले पंचप्यारों में शामिल थे बाल्मिकी समाज के हिम्मत सिंह
धर्म की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह साहब ने धर्मसभा में पांच लोगों से अपना बलिदान देने के लिए कहा था। जो पांच प्रथम व्यक्ति धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश कटाने के लिए उठे थे। उनमें सबसे पहले भाई साहिब सिंह जाति नाई विदर्भ, दूसरा भाई हिम्मत सिंह जाति बाल्मिकी जगन्नाथपुरी, भाई मोहकम सिंह जाति छिमका (कपड़े बनाने वाला) द्वारिकापुरी, भाई धरमसिंह जाति जाट, भाई दयासिंह खत्री लाहौर थे।
गुरू तेगबहादुर का शीश लाने औरगंजेब के किले में गए थे जीवनसिंह
स्वरूपचंद चौहान ने बताया कि गुरू गोविंद सिंह जी के पिता गुरू तेगबहादुर को औरंगजेब ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल करने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद औरगंजेब ने गुरू तेगबहादुर को कई तरह की यातनाएं दीं। लेकिन इसके बाद भी वह नहीं टूटे तक उनका सिर धड़ से अलग कर उनकी हत्या कर दी और धड़ को किले के बाहर भेज दिया जबकि शीश को किले में रख लिया। बिना धड़ के शव का अंतिम संस्कार कैसे हो। इसके बाद गुरू गोविंदसिंह ने अपनी फौज से कहाकि ऐसा कौन है जो गुरू तेगबहादुर का सिर लेकर आए जिससे उनका अंतिम संस्कार हो सके। यह सुनकर फौज का सिपाही जीवन सिंह बाल्मिकी ने कहाकि मैं लेकर आऊंगा। जीवन सिंह स्वीपर के भेष में महल के अंदर गया और गुरू तेगबहादुर का शीश लेकर आया।0000000सत्यापन के लिए भेजी मार्कशीट, परीक्षा विभाग में रिकॉर्ड नहीं मिलाग्वालियर- जेयू में दूरस्थ संस्थान की एक मार्कशीट फर्जी पाई गई है। जेयू के प्रभारी रजिस्ट्रार राजीव मिश्रा के अनुसार कोटा यूनिवर्सिटी के डीन स्टूडेंट वेलफेयर ने छात्र विक्रम कुमार पुत्र हेमराज नागर की मार्कशीट के सत्यापन के लिए पत्र भेजा था। उसमें दूरस्थ संस्थान से 2017 में बीए करना बताया है। जेयू में शनिवार को इस मार्कशीट की जांच की गई तो पता चला कि जेयू के परीक्षा विभाग के टेबुलेशन चार्ट में छात्र का नाम व रोल नंबर अंकित नहीं है।
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