ग्वालियर
मां रतनगढ़ परियोजना के लिए जब निविदा आमंत्रित की गई तब इसका कार्यालय राजघाट नहर परियोजना जल संसाधन विभाग ग्वालियर था। लेकिन अचानक जुलाई के दूसरे सप्ताह में प्रमुख अभियंता द्वारा बामोर कला जिला शिवपुरी को स्थानांतरित कर दिया गया।

अभी कंपनी ने काम भी शुरु नहीं किया था कि सात दिन के अंदर 14 करोड़ रुपए का यह कहते हुए भुगतान कर दिया गया कि कंपनी ने साइट पर पाइप पहुंचा दिए है। पड़ताल में यह साबित हुआ है कि साइट का सर्वे किए बिना ही कंपनी को भुगतान कर दिया गया है। जल संसाधन विभाग के अफसरों ने कार्य स्थानांतरण के पीछे यह तर्क दिया है कि परियेाजना का काम तेज गति से हो सकेगा। जबकि पूर्व कार्य क्षेत्र से यह साइट लगभग 85 किलोमीटर दूर थी और बामोर कला से यह साइट लगभग दो सौ किलोमीटर दूर है। इस मामले में जल संसाधन विभाग के अफसरों से सवाल किए तो उन्होंने कहा कि परियोजना के संबंध में जो शिकायतें की गई हंै, वे सब गलत हैं। परियोजना का काम पहले कहां शुरू कराना है और कहां नहीं, ये हमारी जिम्मेदारी है। जब इस मामले में कंपनी के अफसरों से बात की गई तो उनका कहना था कि हमने स्टील सप्लाई किया है। उसी का ही पेमेंट विभाग ने हमें किया है।
एडवांस का प्रावधान नहीं है
जल संसाधन विभाग में प्रोजेक्ट के लिए एडवांस देने का कोई प्रावधान नहीं है। मैसर्स मैंटेना कंस्ट्रक्शन लिमिटेड को एडवांस पेमेंट देने का मामले मेरे सामने नहीं आया। मैं इस मामले में संबंधित अफसरों से बात करके कार्रवाई करूंगा। एनपी कोरी, चीफ इंजीनियर जल संसाधन विभाग
मई 2019 में हुआ है टेंडर
ग्वालियर, भिंड और दतिया जिले के लिए 831 करोड़ की मां रतनगढ़ बहुउद्देशीय परियोजना को स्वीकृति दी गई है। मई 2019 मेे मैन्टेना विशिष्ट माइक्रो जेवी हैदराबाद का टेंडर फाइनल किया गया। टेंडर की खास बात यह रही कि इसमें टेंडर डालने वाली भी तीनों कंपनियां हैदराबाद की थी। यहां पर यह उल्लेखनीय है कि मैसर्स मैंटेना कंस्ट्रक्शन लिमिटेड हैदराबाद ने ही शिवपुरी जिले की लोअर ओर नदी परियोजना एवं दतिया जिले की मां रतनगढ़ बहुउद्देश्यीय परियोजना के कार्य हैदराबाद की दो अन्य कंपनियों को पार्टनर बनाकर लिए गए हैं। जबकि इन दोनों में मैंटेना ही मुख्य कंपनी है।
बोदी करता है डिजायन फाइनल
अब नए नियमों के मुताबिक कंपनी कार्य का खुद ही डिजायन तैयार करती है। पहले कंपनी कमांड एरिया का सर्वे करती है। उसके बाद पाइप का डायमीटर और डिजाइन सेट कर विभाग को देती है। जलसंसाधन विभाग का भोपाल में बोदी (ब्यूरो ऑफ डिजाइन) इसे फाइनल करता है। बोदी में नहर और डैम के एक्सपर्ट होते हैं। प्रोजेक्ट फाइनल होने के बाद पाइप का डायमीटर और मोटाई तय होती है। उसके बाद कंपनी मौके पर ही पाइप बनाती है।
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