ग्वालियर-
एक इंजीनियर ने दृष्टिहीन बच्चों का भविष्य संवारने के लिए इंजीनियर ने नौकरी छोड़ दी। वह इन बच्चाें काे पढ़ाने के लिए उनकी खातिर खुद भी ब्रेललिपि विधा सीखने के लिए बीएड की पढ़ाई कर रहे हैं।

15 साथियाें की मदद से वह इन बच्चों के लिए मुफ्त हाॅस्टल चला रहे हैं। जहां बच्चाें काे पढ़ाने, रखने और खाने का खर्च वह खुद ही उठाते हैं। इंजीनियर के साथ जुड़े लाेग अपना नाम उजागर नहीं करते और प्रचार-प्रसार भी दूर रहते हैं।यह लोग महीने में एक या दो बार उन बच्चों के पास जरूर जाते हैं जिनकी मदद करते हैं। पिछले 3 साल में यह ग्रुप 45 बच्चाें काे पढ़ा चुका है। इनमें से कुछ बच्चे हाईस्कूल, इंटर और स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। एक बच्चे काे इंडियन आइडल के ऑडिशन के लिए भी बुलावा आया है।
टेलीकॉम कंपनी में रेडियो फ्रिक्वेंसी इंजीनियर रहे ग्वालियर निवासी अंकुश गुप्ता और दृष्टिहीन बैंक कर्मचारी जितेंद्र सिंह ने मिलकर तीन साल पहले दिव्य दृष्टि एजुकेशन वेलफेयर सोसायटी की शुरुआत की थी। दाेनाें सागर में नाैकरी करते थे इसलिए शुरुआती तौर पर वहां के छात्राें काे उन्हाेंने पढ़ाना शुरू किया। बाद में श्री गुप्ता ने नाैकरी छाेड़ दी और ग्वालियर लाैटकर लक्कड़खाना पर किराए के फ्लैट में इस काम काे आगे बढ़ाया। यहां 6 दृष्टिहीन छात्र रहकर पढ़ाई कर रहे हैं और अपनी कला को निखार रहे हैं। संस्था से हाईस्कूल और इंटर करने के बाद दो छात्र सागर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे हैं।
दिव्यांग और दृष्टि बाधित लैपटॉप चलाते हुए।
ऐसे चलता है दृष्टिहीन छात्रों का खर्च: हाॅस्टल को संचालित करने वाले अंकुश गुप्ता क्रिएटिव राइटिंग करते हैं। इससे उन्हें लगभग 12 हजार रुपए की आमदनी होती है। चूंकि वह इन बच्चों के साथ ही रहते हैं इसलिए जो कमाते हैं, इन पर ही खर्च करते हैं। इसके अलावा 15 ऐसे लोग भी हैं जो बिना सामने आए संस्था की मदद करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति 1000 से 1500 रुपए तक देते हैं। बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई पर महीने में लगभग 35 हजार रुपए खर्च होते हैं।
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