ग्वालियर-
अपर सत्र न्यायाधीश रामजी गुप्ता ने शासन की उस अपील को स्वाकार कर लिया, जिसमें कलेक्ट्रेट पहाड़ी के पास स्थित 28 बीघा जमीन की डिक्री को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया और जमीन को निजी न मानते हुए 100 करोड़ से अधिक की जमीन शासन के मालिकाना हक की मानी है।

सिरोल के सर्वे क्रमांक 6 व 8/2 (कलेक्ट्रेट पहाड़ी के पास स्थित) की जमीन पर तोमर बिल्डिंग निवासी संदेश सिंह तोमर व विवेक नगर निवासी शिवेन्द्र प्रताप ने वर्ष 2004 में न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां एक दवा पेश किया। उनकी ओर से तर्क दिया कि इस भूमि को उनके दादा गेंदालाल व दुर्गा प्रसाद को पट्टे पर मिली थी। 30 साल से ज्यादा से इस जमीन पर खेती कर रहे हैं। खसरे में भी उनका नाम लिखा है, इसलिए जमीन का मानिलकाना हक दिया जाए। शासन ने तर्क दिया था कि जमीन शासकीय है। कुछ जमीन वन विभाग की है। जमीन को पट्टे पर नहीं दिया जा सकता है, इसलिए दावे को खारिज किया जाए। लेकिन उस वक्त शासन कोर्ट में उचित गवाही नहीं करा पाया था। इस वजह से जमीन की डिक्री संदेश सिंह तोमर व शिवेन्द्र प्रताप के नाम हो गई। इसके बाद शासन ने अपर सत्र न्यायालय में अपील दायर की। अपील को 24 दिन देरी से पेश करने के आधार पर खारिज कर दिया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भी अपील खारिज कर दी। इसके बाद शासन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की, जिस पर कोर्ट ने आदेश दिया कि जमीन काफी कीमती है। इसलिए शासन को उसका पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाए। इसके बाद अपर सत्र न्यायालय में अपील सुनी गई। कोर्ट में शासन का पक्ष रखते हुए लोक अभियोजक बृजमोहन श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि दोनों सर्वे क्रमांक शासकीय हैं। रिकॉर्ड में हेराफेरी करके दस्तावेज पेश किए गए हैं। इसमें वन विभाग की भी भूमि है। वन विभाग की भूमि को वन अधिनियम की धारा 2 के तहत किसी को पट्टे पर नहीं दिया जा सकता है। इसलिए डिक्री के आदेश को निरस्त किया जाए। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने शुक्रवार को अपना फैसला सुनाया। न्यायिक मजिस्ट्रेट के डिक्री के फैसले को निरस्त कर दिया और जमीन को शासन के मालिकाना हक की मानी है।
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