ग्वालियर
दिगंबर पंथ की दीक्षा लेने के साथ ही शरीर संस्कार का त्याग कर देते हैं। इसमें नाहना भी शामिल है। दीक्षा के बाद दिगंबर मुनि जीवन में कभी भी स्नान नहीं करते हैं। लेकिन बिना स्नान किए हुए भी उनके शरीर से किसी भी प्रकार की दुर्गंध एवं गंदगी नहीं रहती है। साथ ही जीवन में कभी भी शरीर पर पानी नहीं डालने के बाद भी काया हमेशा दमकती रहती है। इसका कारण है ध्यान, तपस्या और सात्विक जीवन शैली।
दिगंबर मुनि के जीवन शैली के बारे में मुनिश्री विहसंत सागर महाराज ने पत्रकार को बताया कि उन्होंने 16 साल की उम्र में दीक्षा ग्रहण कर ली थी। उन्हें दीक्षा लिए हुए 19 वर्ष का समय बीत चुका है। इस 19 साल में उन्होंने एक भी बार स्नान नहीं किया है। स्नान किए बिना शरीर से दुर्गंध का नहीं आना और गंदगी नहीं दिखने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि दिगंबर साधू का मूलगूढ है नाहना (स्नान) का त्याग। उन्होंने बताया कि दिगंबर पंथ में नहाने का त्याग इसलिए किया जाता है क्योंकि नहाने के लिए मनुष्य के पास, बाल्टी, लोटा, साबून, वस्त्र आदि की जरूरत होती है। नहाने के बाद मनुष्य शरीर पर तेल, क्रीम आदि भी लगाता है। लेकिन दिगंबर साधू के पास मात्र एक पिच्छी (मोरपंख से बनी एक प्रकार से झाडू) और कमंडल रहता है। कमंडल में हमेशा जलभरा रहता है जिसे दिगंबर साधू दिन में सिर्फ एक बार ही भरता है। उन्होंने बताया कि दिगंबर मुनि आजीवन ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं। नाहने के बाद मनुष्य का शरीर सुंदर दिखने लगता है। दिगंबर मुनियों के पास सभी प्रकार के भक्त भी आते हैं इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। शरीर सुंदर नहीं दिखे जिससे ब्रम्हचर्य के पालन में कोई परेशानी नहीं हो इसके लिए भी नाहने की मनाही होती है।
पानी अनमोल है इसे बचाओं
दिगंबर मुनि विहसंत सागर महाराज ने बताया कि दिगंबर पंथ में पानी को सबसे अधिक अमूल्य माना गया है। इसलिए दिगंबर संत सिर्फ पानी का उपयोग लघुशंका के बाद हाथ धोने एवं घुटनों के नीचे पैरों को धोने के लिए ही करते हैं। इसके बाद पानी का उपयोग सिर्फ पीने के लिए किया जाता है।
जैसा खाओंगे अन्न वैसा पाओंगे मन और तन
दिगंबर मुनि हमेशा सात्विक भोजन ही करते हैं। साथ ही वह ऐसे व्यक्ति के घर भोजन पर जाते हैं जिसके घर हमेशा सात्विक भोजन बनता हो। उन्होंने कहाकि गंदा खाना खाने से पसीना भी गंदा आएगा जिससे बदबू आएगी। लेकिन सात्विक भोजन करोंगे तो पसीने से भी बदबू नहीं आएगी। उन्होंने कहाकि जैसा आपकों खाओंगे वैसी ही सुगंध शरीर को मिलेगी। सात्विक भोजन लगातार करते रहने से शरीर से हमेशा सुगंध आने लगती है।
ध्यान, तपस्या और साधना से बन जाता है आभामण्डल
दिगंबर मुनि विहसंत सागर महाराज ने बताया कि संत और साधू हमेशा ध्यान, तपस्या , स्वाध्याय और आध्यात्मिक साधना में लीन रहते हैं। इसके कारण उनके शरीर के आसपास पूरा एक आभामण्डल तैयार हो जाता है। इसके कारण साधुओं का शरीर हमेशा चमकता रहता है।
पहले भी तपस्वी कभी नहीं करते थे स्नान
मुनि विहसंत सागर के अनुसार पहले भी साधू जो ध्यान, स्वाध्याय, तपस्या करते थे वह एक ही स्थान पर महीनों बैठकर ध्यान लगाते थे। इसके कारण वह कभी भी नहा नहीं पाते थे। लेकिन इसके बाद भी उनका शरीर हमेशा पवित्र रहता था। आज भी नागा साधू चार साल तक लगातार तपस्या में संलग्न रहते हैं और हमेशा भस्म रमाए रहते हैं। वह सिर्फ कुंभ के समय ही बाहर आते हैं और पवित्र पानी में डुबकी लगाते हैं। इसके बाद वह फिर से साधना करने के लिए हिमालय में चले जाते हैं।
साधना का रहता है तेज
विहसंत सागर महाराज ने बताया कि जो भी व्यक्ति साधना करता है। उसके शरीर से अपने आप ही एक तेज उत्पन्न होने लगता है। जो कि शरीर का तेज ना होकर आत्मा का तेज रहता है।
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