पढ़ाई के लिए किराए का कमरा लेने नहीं थे पैसे, अब महेश शर्मा को मिलेगा पद्मश्री
पद्मश्री के लिए चयनित झाबुआ के गांधी कहे जाने वाले दतिया जिले के घूघसी गांव में जन्मे महेश शर्मा का बचपन कठिनाइयों से भरा रहा। प्राइमरी पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल नहीं था तो उन्हें दतिया शहर आना पड़ा। लेकिन किराए का कमरा लेने के भी उनके पास पैसे नहीं थे। लेकिन फिर भी वे दतिया शहर आ गए।
दतिया के घूघसी गांव के रहने वाले हैं पिता की इच्छा के विरुद्ध चुना रास्ता
यहां पर राजगढ़ चौराहे के पास सत्यनारायण मंदिर के महंत अमरदास से उनकी मुलाकात हुई और उन्हें रहने का ठिकाना मिल गया। इस मंदिर के महंत ने इस शर्त पर उन्हें रहने की अनुमति दी थी कि सुबह-शाम पूजा करना पड़ेगी। महेश शर्मा ने दतिया में कक्षा छह से लेकर 12 वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद ग्वालियर से ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद सेवा भाव का रास्ता चुना।
परिवार ने किया विरोध: इसका परिवार ने जमकर विरोध किया। पिता सिया प्रसाद दुबे तो इतने विरोध में थे कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर न केवल खरीखोटी सुनाई बल्कि भविष्य बर्बाद न करने की चेतावनी भी दे डाली। लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। झाबुआ में शिवगंगा बहाकर आदिवासी समुदाय के उत्थान में जुट गए। इसी की बदौलत अब इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।
छह भाई थे: महेश शर्मा के बड़े भाई डॉ ओपी दुबे ने बताया कि दतिया मुख्यालय से 27 किमी दूर घूघसी गांव में हम लोगों का जन्म हुआ था। हम लोग छह भाई थे। इसमें महेश तीसरे नंबर का और मैं दूसरे नंबर का। प्राइमरी स्तर की शिक्षा गांव में रहकर पूरी की। लेकिन गांव में मिडिल स्कूल नहीं होने के कारण दतिया आना पड़ा। हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि किराए का कमरा लेकर दतिया शहर में रह सकें। इस बीच हमारी मुलाकात राजगढ़ चौराहे के पास बने सत्यनारायण मंदिर के अमरदास महंत से हुई। उन्हें अपनी परेशानी बताई तो उन्होंने कहा कि आप लोग यहां रह सकते हैं लेकिन आपको सुबह-शाम मंदिर में पूजा करना पड़ेगी।
सरकारी स्कूल में की पढ़ाई: महेश पीतांबरा पीठ के पास सरकारी स्कूल में पढ़ते थे और नरसिंह टीला मंदिर पर पूजा अर्चना करते थे। इस बीच वह विद्यार्थी परिषद से जुड़े। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज गए, लेकिन इसी बीच इमरजेंसी लग गई। इसके बाद महेश ने दतिया के बजाए ग्वालियर से ग्रेजुएशन किया। चूंकि अब तक महेश के परिवार की आर्थिक हालत में कुछ सुधार हुआ तो ग्वालियर में 7 रुपए प्रतिमाह पर किराए से कमरा लेकर रहे। ग्रेजुएशन के बाद पिता सिया प्रसाद दुबे चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी करे। लेकिन वह नहीं मानें और पिता की इच्छा के विरुद्ध आरएसएस के माध्यम से समाजसेवा से जुड़ गए। जबकि उस समय उन्हें मेरी तरह सरकारी नौकरी आसानी से मिल सकती थी।
आरएसएस के प्रचारक बने: आरएसएस के प्रचारक रहते हुए इन्हें सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान का संगठन मंत्री बनाया। 1998 में वनवासी कल्याण परिषद झाबुआ का महामंत्री बनाकर झाबुआ भेजा गया। तब से यह वहीं के होकर रह गए। जनहितैषी व जनजागरूकता के लिए अभियान चलाया। लेकिन वह संतुष्ट नहीं थे। इसलिए उन्होंने हलमा के माध्यम से शिवगंगा अभियान की शुरूआत की। अभियान से अब तक 1 लाख 11 हजार जल संरचनाएं जनभागीदारी से बनवाईं। हजारों वृक्ष लगाए। इसका नतीजा है कि करोड़ों लीटर पानी जमीन में उतरा और जलस्तर बढ़ गया। सूखे से जूझने वाले गांव, जहां खेती नहीं हो पाती थी, वहां कायाकल्प हो गया। वनवासी दो फसल लेकर अपने जीवन स्तर को सुधार रहे हैं।
छह भाईयों में तीसरे नंबर के हैं महेश : महेश शर्मा छह भाईयों में तीसरे नंबर के हैं। सबसे बड़े शिवकुमार दुबे, फिर डॉ. ओपी दुबे, इसके बाद महेश शर्मा, सुरेश दुबे, सुदामा दुबे एवं बृजभूषण दुबे।
झाबुआ से पहले से ही था लगाव: महेश के दूसरे नंबर के बड़े भाई डॉ. ओपी दुबे बताते हैं कि 1985 में मेरी आयुष चिकित्सक के रूप में ज्वाइनिंग अलीराजपुर के पास चांदपुर में हुई थी। वहां अक्सर महेश मुझसे मिलने आते थे। वहां आदिवासी समुदाय की स्थिति देखकर उनके मन में उनके उत्थान के लिए विचार चलते थे। 1998 में उन्हें मौका मिला, तो वह उनके बीच ही रच बस गए। भाई बृजभूषण दुबे बताते हैं कि वह अक्सर हलमा में शामिल होने झाबुआ जाते हैं। उन्होंने बताया कि पहली बार जल को सहजने के लिए हलमा किया गया था, जिसमें 800 लोग शामिल हुए थे। इसके बाद कारवां बढ़ता गया। आज अभियान से जल संरचनाएं व लगाए गए 70 हजार से अधिक वृक्ष जंगल का रूप ले रहे हैं। उनके द्वारा झाबुआ नेचुरल अभियान, जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी शुरू किया गया है।
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