ग्वालियर-
गुरु, गाय और ग्रंथों का मनुष्य के जीवन में होना अनिवार्य है। क्योंकि गुरु से मिलने वाला आध्यात्मिक और ससांरिक ज्ञान मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है। वहीं ग्रंथ हमें धार्मिक ज्ञान देते हैं। गाय के दूध से बुद्धि तीक्ष्ण होती है। साथ ही गाय की सेवा से मनुष्य की बुद्धि में दिव्यता आती है और यही दिव्यता कर्मों को दिव्य बनाती है। यह बात छत्री मैदान में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन कथाव्यास कनकेश्वरी देवी ने कही।
कथाव्यास कनकेश्वरी देवी ने कहा कि गुरु, ग्रंथ और गाय यह त्रिशक्तियां हैं। अगर हमारे जीवन में यह त्रिशक्तियां नहीं आती हैं तो हमारा जीवन सार्थक दिशा में नहीं जा सकता है। साथ ही हमारे शरीर का विकास भी नहीं होगा। उन्होंने कहा कि गाय ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसे अपनाने से मनुष्य के अंदर सात्विकता बढ़ती है। साथ ही घर के अंदर महालक्ष्मी का वास भी होता है। शरीर कर्म के बिना नहीं रह सकता है। अगर मनुष्य के पास यह त्रिशक्तियां नहीं होती हैं तो मनुष्य बुरे कर्मों के दलदल में फंस जाता है। इसी दलदल के कारण मनुष्य का जीवन समाप्त हो जाता है।
ग्रंथों में है सभी प्रकार की ऊर्जाओं का समावेश
मनुष्य को अपने शरीर की ऊर्जा ग्रंथों के अध्ययन में अथवा प्रभु के चिंतन में लगानी चाहिए। धार्मिक अध्ययन एवं प्रभु चिंतन में लगी हुई ऊर्जा कभी भी गलत दिशा में नहीं जाती है। लेकिन अगर मनुष्य प्रभु चिंतन और धार्मिक अध्ययन नहीं करता है तो मनुष्य की ऊर्जा गलत दिशा में जाती है, जिससे मनुष्य के अंदर तामसी शक्तियां अधिक हो जाती है। जो कि उसके पतन का कारण बनती हैं। इसलिए हमें अपनी ऊर्जा को गलत दिशा में जाने से रोकना होगा। दीपक के प्रकाश को हवा बुझा सकती है लेकिन भक्ति के प्रकाश को कोई नहीं बुझा सकता है।
मृत्यु का भय ही महारोग है
मनुष्य को अपना जीवन सद्कर्म और प्रभु भक्ति में लगाना चाहिए। क्योंकि जो व्यक्ति सद्कर्म नहीं करता है और अपने जीवन को प्रभु भक्ति में नहीं लगाता है उसे हमेशा मृत्यु का भय बना रहता है। पाप के परिणामों से बचाने का उपाय तो केवल प्रभु के पास ही है। काल को डरावना नहीं समझना चाहिए। क्योंकि मृत्यु तो इस जगत का महासत्य है। काल को नहीं मनुष्य को अपने कमार्े से डरना चाहिए। क्योंकि जैसा मनुष्य कर्म करता है वैसा ही उसे फल मिलता है। सद्कर्म और ईश्वर भक्ति से मनुष्य में वैराग्य और ज्ञान आता है। ज्ञान और वैराग्य ही भक्ति की संतान हैं।
जैसा बांटोगे वैसा मिलेगा।
मनुष्य दूसरों को जैसा बांटता है वैसा ही उसके बदले में मनुष्य को मिलता है। मनुष्य अगर दूसरों को सुख बांटेगा तो उसे सुख मिलेगा। अगर वह दुख बांटेगा तो उसे दुख मिलेगा। इसलिए मनुष्य को दूसरों के दुखों में शामिल होकर सुख बांटना चाहिए।
आरती कर प्रारंभ हुई श्रीमद् भागवत कथा
कथा के प्रारंभ में केन्द्रीय मंत्री व परीक्षित नरेन्द्र सिंह तोमर उनकी धर्मपत्नी किरण सिंह , पुत्र देवेन्द्र प्रताप सिंह रामू, महापौर विवेक शेजवलकर, सभापति राकेश माहौर, आदि ने श्रीमद् भागवत कथा की आरती उतारी एवं पुष्प अर्पित किए।
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