ग्वालियर
आदर्श आचार संहिता का खौफ भले ही अफसरों और आम जनता के कामों पर दिखाई देता हो, लेकिन जनप्रतिनिधियों को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पिछले दो माह में 9 मौजूदा और पूर्व विधायक चुनावी आचार संहिता के दौरान उन पर दर्ज आपराधिक मुकदमों से बरी हो चुके हैं।
सभी मुकदमों में एक ही बात कॉमन है और वह है अभियोजन पक्ष पर्याप्त साक्ष्य पेश कर पाने में नाकाम रहा और ज्यादातर गवाह पूर्व में दिए बयानों से मुकर गए। सभी फैसले भोपाल स्थित सांसद-विधायकों के लिए गठित स्पेशल कोर्ट ने किए हैं।
हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में आचार संहिता की छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 8 हजार शिकायतें निर्वाचन आयोग को मिली थीं। इनमें 7500 से अधिक शिकायतों का निराकरण तत्काल कर दिया गया। बाकी में वैधानिक कार्यवाही जारी है।
प्रदेशभर में लगभग 100 से अधिक एफआईआर भी दर्ज हुई हैं। 2013 में आचार संहिता उल्लंघन के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि तब 5500 शिकायतें आयोग को मिली थीं, जिनमें से 95% का निकारण हो गया था। 5% गंभीर शिकायतें थीं।
जिन पर एफआईआर दर्ज हुई, उनमें जिला स्तर पर अदालतों में मुकदमे भी दर्ज हुए, लेकिन अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है जिसमें आचार संहिता के दौरान आपराधिक मुकदमा दर्ज होने पर किसी भी जनप्रतिनिधि को सजा मिली हो।
नाकामी… लगभग सभी मामलों में अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया आरोप
गौरीशंकर बिसेन (भाजपा), बालाघाट : मलाजखंड पुलिस ने 16 नवंबर 2013 की रात 9 बजे एक भवन पर छापामार कार्रवाई की। यहां ग्रामीणों को वोट के बदले भोजन के साथ पारितोषण सामग्री बांटी जा रही थी। पुलिस ने मौके से तीन स्थानीय भाजपा नेताओं को गिरफ्तार किया था।
चार्जशीट के मुताबिक भोजन और पारितोषण सामग्री पूर्व कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन को वोट देने के लिए बटवाई जा रही थी, इसलिए उन्हें भी आरोपी बनाया गया था। अगस्त-18 को केस ट्रांसफर होकर भोपाल स्पेशल कोर्ट आया, लेकिन केस के सभी गवाह जिनमें कुछ सरकारी कर्मचारी भी थे, अपने बयानों से मुकर गए। अदालत ने 28 सितंबर को सभी को दोषमुक्त कर दिया।
गोपाल सिंह चौहान (कांग्रेस) : चंदेरी 2014 के आम चुनाव में चंदेरी पुलिस ने विधायक गोपाल सिंह चौहान और उनके समर्थक पर भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट, चुनाव सामग्री नष्ट करने और धमकी देने का केस दर्ज किया था। जुलाई-18 में केस ट्रांसफर होकर भोपाल आया। फरियादी अपनी ही शिकायत से मुकर गए। कोर्ट ने चौहान को दोषमुक्त कर दिया।
कंकर मुंजारे (सपा), बालाघाट : 7 नवंबर 2013 को बिना परमिशन गोंदिया रोड ब्लॉक कर सभा की और जुलूस निकाला। पुलिस ने वीडियोग्राफी कराई और बाद में मुकदमा दर्ज किया। जनवरी-14 में चार्जशीट फाइल हुई। चार साल बाद केस भोपाल ट्रांसफर हुआ, लेकिन पुलिस के अलावा किसी स्वतंत्र गवाह ने बयान नहीं दिया। कोर्ट ने मुंजारे को दोषमुक्त कर दिया।
बृजेंद्र तिवारी (भाजपा), भितरवार : 25 नवंबर 2008 को रात 8.40 बजे भाजपा प्रत्याशी बृजेंद्र तिवारी ने चीनोर में सभा और जुलूस निकाला, जबकि 27 नवंबर को मतदान होना था। सितंबर 2018 को केस भोपाल स्पेशल कोर्ट में आया। कोर्ट ने आचार संहिता उल्लंघन के सबूतों को अपर्याप्त और विश्वास योग्य न मानते हुए तिवारी को दोषमुक्त कर दिया।
नरेंद्र कुशवाह (भाजपा), भिंड : 2004 में तत्कालीन भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह समेत 6 के खिलाफ बूथ कैप्चरिंग का मुकदमा दर्ज हुआ था। 8 साल बाद चार्जशीट दायर हुई। 2013 में हाईकोर्ट के दखल के बाद नरेंद्र सिंह कुशवाह को फरार घोषित किया गया। 14 साल पुराने इस केस में ज्यादातर गवाह पलट गए। कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
एक अन्य मामला ग्वालियर जिले का चुनाव आयोग में सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट में भीलंबित हे जो चर्चित हेकरीब ८ साल से अधिक समयसे कोर्ट की तारीखों पेचीदगियों में उलझा हे
गवाहों ने पहचानने से किया इनकार, कांग्रेस के चार नेता हुए बरी
सितंबर-11 में कांग्रेस नेताओं ने इंदौर-धार हाईवे पर प्रदर्शन करते हुए चक्काजाम किया था। राजनीतिक लाभ के लिए किए गए इस प्रदर्शन में लाखों लोग प्रभावित हुए। जिला प्रशासन ने जीतू पटवारी, तुलसी सिलावट, सत्यनारायण पटेल और अंतर सिंह दरबार समेत 11 कांग्रेसी नेताओं पर केस दर्ज किया।
इस केस में सितंबर 2013 में चार्जशीट दायर की गई। 5 साल बाद यह केस ट्रांसफर होकर भोपाल आया। पुलिस और प्रशासन किसी भी नेता पर कोई आरोप साबित नहीं कर पाए। अभियोजन के गवाहों ने आरोपी बनाए गए नेताओं को पहचानने से ही इनकार कर दिया। कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया।
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