ग्वालियर-
बिजली बिल किसानों को राहत देने के लिए आधा करने का फैसला भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। हालांकि सरकार फिलहाल इसे लागू करेगी इसमें संदेह है। इसी तरह इंदिरा गृह ज्योति योजना के तहत सौ यूनिट बिजली सौ रुपए में देने का वचन भी है। कर्जमाफी के बाद प्रदेश के आर्थिक हालात और चुनौतीपूर्ण बन गए हैं। अगले छह महीने में सरकार जो भी लोक-लुभावन घोषणाएं करेगी, उसका आधार कर्ज ही होगा। रिजर्व बैंक के नियमों के हिसाब से अभी सरकार के पास कर्ज लेने की पात्रता तो है लेकिन हालात सुधारने के लिए स्थाई समाधान ढूंढ़ना होगा। प्रमोशन में आरक्षण का मसला सरकार के सामने लंबित है। नई सरकार को इसके नए नियम बनाने हैं और सभी वर्गों में सामंजस्य बैठाना है। संविदाकर्मियों और दैनिक वेतनभोगियों को नियमित करने का वादा भी काफी मुश्किल है। कर्मचारी इस बात पर दबाव बनाएंगे कि लोकसभा चुनाव से पहले यह वचन भी पूरा हो जाए। मुख्य सचिव 31 दिसंबर को रिटायर हो रहे हैं और कमलनाथ के पास अच्छे विकल्प सीमित हैं। उन्हें सही फैसला करना होगा। इसी तरह वित्त के प्रमुख सचिव पर भी उन्हें निर्णय करना होगा। जिलों में तत्काल अच्छी टीम बनानी होगी जिससे प्रशासनिक निर्णय आम जनता तक जल्दी पहुंच सकें। मप्र की ब्यूरोक्रेसी को लेकर जो एक अलग तरह की छवि बन गई है उसे भी तोड़ना होगा।
राजनीतिक चुनौतियां: विधानसभा के नतीजों में भाजपा अभी 17 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस से आगे है। कांग्रेस की बढ़त सिर्फ 12 सीटों पर है। 29 लोकसभा क्षेत्रों में अगर कांग्रेस को अच्छा प्रदर्शन करना है तो कम से कम 20 सीटों पर आगे रहना होगा। वोट के लिहाज से कांग्रेस के वोट (15595153) भाजपा के वोट(1564298) से 47817 कम हैं। कांग्रेस का वोट प्रतिशत 40.89 व भाजपा का 41.02 है। इसे कांग्रेस के पक्ष में बदलना होगा। राजनीतिक संतुलन बनाने में कमलनाथ बेजोड़ हैं लेकिन उन्हें अपनी इस ताकत का इस्तेमाल पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गजों को संभालने में करना होगा। मंत्रिमंंडल के गठन में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि वे कैसे क्षेत्रीय और गुटों का संतुलन बनाते हैं।
सामाजिक चुनौतियां: आर्थिक आरक्षण का मुद्दा अपनी जगह कायम है। भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। कमलनाथ सरकार अगर प्रमोशन में आरक्षण पर कोई फैसला लेती है तो यह विषय एक बार फिर सामने आ जाएगा। इस बार भाजपा भी आक्रामक रहने वाली है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर प्रदेश की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यह पुलिस से ज्यादा सामाजिक समस्या है और इस पर ठोस काम की जरूरत है। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन से सवर्ण वर्ग नाराज है। चुनाव में भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। इस मुद्दे को राजनीतिक सूझबूझ के साथ हल करना होगा। भाजपा के पास राम मंदिर मुद्दा है और इस चुनाव में कांग्रेस ने इसे बहुत ही समझदारी से अपने नियंत्रण में रखा है। आने वाले दिनों में भाजपा व संघ परिवार ज्यादा सक्रिय होगा तब भी ऐसी ही समझदारी दिखानी होगी। ये वो चुनौतियां है जिनका आने वाले समय में नई सरकार को सामना करना पड़ेगा। अभी कांग्रेस भाजपा से सीटों के गणित में आगे लेकिन वोटों के गणित में पीछे है। आने वाले समय में सबसे पहली परीक्षा लोकसभा चुनावों में होगी और तभी यह तय होगा कि किसानों की कर्जमाफी सिर्फ विधानसभा चुनाव का ही मुद्दा है या वाकई लोकसभा में भी यह भाजपा को बड़ी चुनौती देगी।
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