ग्वालियर
पिता का साया बच्चों पर छत की तरह होता है। बच्चे को कोई भी परेशानी आए, लेकिन पिता उसका सामना करता है। आज हम आपको ऐसे पिता की कहानियां बताने जा रहे हैं, जिनका बच्चों के साथ खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन वह उनके लिए मजबूत छत बने हुए हैं। बल्कि वह उन बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में कामयाब रहे हैं। इसके अलावा ऐसी संस्था भी है जो पिता की तरह बच्चों का भरण-पोषण करती है और भव्य कार्यक्रम में बच्चों का नामकरण भी करती है। इस संस्था के पास 6 वर्ष तक के बच्चों पालन-पोषण किया जाता है। कुछ ऐसे पिता भी हैं जो मां की भूमिका में बच्चों का ख्याल रख रहे हैं।
खुद के संतान नहीं, बच्चों को गोद लेकर करते हैं भरण-पोषण
बात 2011 की है, जब मैं (प्रदीप) प|ी पूजा सिंह के साथ गेंडे वाली सड़क से निकल रहा था। वहां सड़क किनारे दो बच्चे मिले, जिनकी स्थिति ठीक नहीं थी। पूछने पर पता चला कि उनके मां-पिता अब इस दुनिया में नहीं है। तभी हम दोनों ने उन बच्चों की परवरिश करने का संकल्प ले लिया। उन्हें गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करने के बाद दोनों का एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन कराया गया। यह सुख हमारे लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि हमारे कोई संतान नहीं है। तब से अब तक हम इन बच्चों की परवरिश कर रहे हैं।
20 साल से पिता की तरह दिया दुलार, इच्छा इंजीनियर बने बेटा
पिता की तरह बेटे के साथ रोजाना शाम को साथ बैठना और हर सुख-दुख को एक-दूसरे से बांटना। यह रूटीन है कंपू पर रहने वाले राममोहन त्रिपाठी का। उन्होंने बताया कि जब वे गाजियाबाद में एक कंपनी में बतौर कांट्रेक्टर काम करते थे। वहां उनकी मुलाकात राजेंद्र प्रसाद चौरसिया से हुई, जो वहां मजदूरी करते थे। उस दौरान वे उन्हें लेकर ग्वालियर आए और उनके बच्चे संदीप का दाखिला स्कूल में कराया। वर्तमान में यही बच्चा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और इसकी पूरी पढ़ाई का खर्च वह खुद उठा रहे हैं।
3 साल की थी बेटी, मां नहीं रहीं, पिता ने निभाई मां की भूमिका
माधौगंज में रहने वाले राजकुमार पाठक बताते हैं कि वर्ष 2003 में कैंसर की वजह से प|ी इस दुनिया में नहीं रहीं। तब मेरी बेटी मात्र तीन साल और बेटा 12 साल का था, तब से ही मैंने बच्चों के लिए मां की भूमिका अदा की। सुबह नाश्ते से लेकर रात का खाना बनाकर खिलाया। साथ ही उनकी परेशानियों को इस तरह समझा, जैसे एक मां समझती है। 16 साल से वे दोनों बच्चों के साथ पिता, मां और दोस्त की तरह रह रहे हैं, ताकि उन्हें मां की कोई कमी महसूस न हो और बच्चे बिना किसी डर के अपनी हर बात पिता से साझा कर पाते हैं।
संस्था बच्चों का पिता बनकर रखती है ख्याल
एक ऐसी संस्था जो न केवल बच्चों की देखभाल के लिए पिता की भूमिका में है, बल्कि भव्य समारोह में उनका नामकरण भी करवाती है। कुछ ही वर्ष पहले शुरू हुई इस संस्थान में 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों का पालन-पोषण किया जाता है और उम्र के हिसाब से उन्हें स्कूल भी भेजा जाता है। मातृछाया नाम की इस संस्था में ऐसे बच्चों को रखा जाता है, जो बेसहारा हैं या फिर उनके मां-पिता किसी कारणवश उन्हें छोड़ गए हैं। संस्था के अध्यक्ष राजेंद्र बांदिल बताते हैं कि इसकी प्रेरणा मुझे दिवंगत विष्णु कुमार से मिली। उनकी प्रेरणा से ही सभी ने धीरे-धीरे संस्था को इस स्तर तक पहुंचाया। हमारा उद्देश्य एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, ताकि दूसरों को इससे प्रेरणा मिले।
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