ग्वालियर-
ग्वालियर नगर निगम में 7 करोड़ 54 लाख रुपए के शौचालयों की नियम विरुद्ध स्वीकृति देने के आरोप में घिरे अधिकारी मौन साध गए हैं। उन्होंने निगमायुक्त के 17 जून को दिए गए नोटिस का जबाव तक नहीं दिया है। केवल बाबू ने ही आयुक्त के नोटिस का जबाव दिया है। वरिष्ठ अधिकारियों की भी चुप्पी से सवाल खड़े होने लगे हैं।
इन्हें थमाए हैं नोटिस
गड़बड़ी का खुलासा होने के बाद निगमायुक्त संदीप माकिन ने वित्त विभाग के अपर आयुक्त देवेन्द्र पालिया, जनकार्य विभाग के अधीक्षण यंत्री प्रदीप चतुर्वेदी, मुख्य समन्वयक अधिकारी(सीसीओ) प्रेम पचौरी, सहायक इंजीनियर सतेन्द्र यादव, सब इंजीनियर राजेश सिंह परिहार तथा बाबू जुहेब सिद्धीकी को नोटिस जारी किए हैं। इसमें स्वच्छता अभियान से जुड़े अपर आयुक्त को बचा लिया गया। यह नोटिस 17 जून को देकर एक सप्ताह में स्पष्टीकरण मांगा था, लेकिन अब तक केवल जुहेब ने ही जबाव दिया है।
बाबू से लेकर आयुक्त तक की कलम फंसी
गड़बड़ी में बाबू से लेकर निगमायुक्त तक की कलम फंसी है। इसलिए मामले को रफा दफा करने की तैयारी की जा रही है। निगम प्रशासक एमबी ओझा ने अब सख्ती बरती है। उन्होंने फिर से फाइल मंगाई है, लेकिन बुधवार तक यह फाइल उनके पास नहीं पहुंची। स्थानीय निधि संपरीक्षा(आरएडी) की एक पूरी टीम निगम में बैठती है। यह कोष एवं लेखा विभाग की ऑडिट टीम होती है। इस विभाग का काम वित्तीय अनियमितता रोकना था शासन के नियमों का पालन कराना है। इसी तरह वित्त विभाग में एकाउंट ऑफिसर तथा अपर आयुक्त की नियुक्ति शासन का वित्त विभाग करता है। शासन व निगम के नियमों का पालन कराना भी इस विभाग की जिम्मेदारी हैं। लेकिन नियम विरुद्ध होने के बाद भी दोनों विभागों ने शौचालय निर्माण की वित्तीय स्वीकृति की फाइलों को मंजूर कर दिया। उन्होंने कोई आपत्ति भी नहीं लगाई। स्वच्छता अभियान से जुड़े अपर आयुक्त ने भी फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए।
7.54 करोड़ का मामला
स्वच्छ भारत अभियान के तहत निगम प्रशासन ने पिछले साल मई में 29 सामुदायिक तथा 16 सार्वजनिक शौचालय बनाने का निर्णय लिया। सुलभ इंटरनेशनल फर्म को सामुदायिक शौचालय के लिए 3 करोड़ 84 लाख 31 हजार 641 का 19.95 फीसदी अधिक दर पर यानी 4.60 करोड़ तथा सार्वजनिक शौचालय के लिए 2 करोड़ 45 लाख 10 हजार 952 का काम 19.95 फीसदी अधिक दर पर यानी 2 करोड़ 94 लाख का वर्क ऑर्डर जारी किया। निगमायुक्त को अधिकतम 2 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति के अधिकार हैं। पांच करोड़ तक की मेयर इन काउंसिल तथा 10 करोड़ तक की वित्तीय स्वीकृति के लिए फाइल निगम परिषद से मंजूर कराना होता है। लेकिन दोनों फाइलें 2 करोड़ से अधिक राशि की थीं। निगम ने 25 जुलाई 2019 में टेंडर लगवाए और 31 अगस्त 2019 को फर्म से अनुबंध भी कर लिया। फर्म से परफोर्मेंस गारंटी तक जमा नहीं कराई। उस समय निगम परिषद अस्तित्व में थी, इसलिए फाइल परिषद में जाना थी। लेकिन उसे निगमायुक्त ने ही मंजूर कर दिया। बाद में निगम प्रशासक को प्रस्ताव भेज दिया। शौचालयों का कुछ काम होने पर फर्म ने भुगतान के लिए बिल प्रस्तुत किया। ऑडिट तथा वित्त विभाग ने आपत्ति किए बिना ही 30 जनवरी 2020 को 35 लाख का भुगतान भी कर दिया। यह शिकायत अब लोकायुक्त में पहुंची है इसलिए फिर फाइल खुल गई है।
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