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गुलाब सिंह माथुर चर्चित आरोपी की याचिका को खारिज ,परीक्षा में धोखाधड़ी का अवसरदेने वालों पर हो कार्यवाही- उच्च न्यायालय

ग्वालियर। हाईकोर्ट ने व्यावसायिक परीक्षामंडल घोटाले में आरोपी गुलाब सिंह माथुर की मेडिकलकॉलेज से की गई बर्खास्तगी को समाप्त करने के लिए जोयाचिका प्रस्तुत की गई थी उसको न्यायालय ने खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि धोखाधड़ी कर
परीक्षा पास करने केइस मामले मेंयाचिकाकर्ता को कोईराहत नहीं दी जा
सकती है।
वहीं न्यायालय नेकहा कि ऐसी परीक्षाओंमें जो परीक्षक मूक दर्शक बनकर धोखाधड़ी होने देते हैंउनके खिलाफ भी कार्यवाही होना चाहिए।न्यायमूर्ति शील
नागू एवं न्यायमूर्ति जीएस अहलुवालिया ने गुलाब सिंहमाथुर की याचिका को खारिज करते हुए यह भी कहा कियाचिकाकर्ता की ओर से जो न्यायिक दृष्टांत प्रस्तुत किए गए
हैं उससे याचिकाकर्ता को कोई लाभ नहीं मिल सकता है।न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि किसीपरीक्षा में परीक्षकों को छात्रों से भय लगता है तो वहां सुरक्षाके लिए प्रबंध भी होना चाहिए। याचिकाकर्ता गुलाब सिंह
माथुर ने यह याचिका जीआर मेडिकल कॉलेज द्वारा उसकेखिलाफ धोखाधड़ी से पीएमटी पास करने तथा एमबीबीएसमें प्रवेश लिए जाने पर उसके प्रवेश को निरस्त किए जानेके खिलाफ प्रस्तुत की थी। याचिका में मेडिकल कॉलेज के
इस आदेश को निरस्त करने का निवेदन किया गया था।
यह है पूरा मामला
याचिकाकर्ता गुलाब सिंह माथुर के खिलाफ झांसी रोडधाना पुलिस ने पीएमटी 2008 में फर्जी तरीके से परीक्षापास करने पर भादसं की धारा 419, 420, 467, 468,471, 201 और 120 बी परीक्षा अधिनियम के तहतमामला दर्ज किया गया है। गुलाब सिंह ने अपने स्थानपर सॉल्वर के जरिए यह परीक्षा पास की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसके खिलाफसीबीआई को कोई सबूत नहीं मिले हैं। उसके खिलाफजो प्रकरण है वह पूरी तरह इकबालिया बयान पर
आधारित है। आरोपी के आवेदन का असिस्टेंटसोलिसिटर जनरल विवेक खेड़कर ने विरोध किया औरकहा कि ऐसे ही मामले में आरोपियों को पूर्व में कोई
राहत नहीं दी गई है। इस संबंध में उन्होंने न्यायिकदृष्टांत भी प्रस्तुत किए। जिसमें आरोपी द्वारा बोर्डपरीक्षा में गड़बड़ी करने के बाद में उसके ग्रेजुएशन करने
व नौकरी प्राप्त करने के बाद पूर्व की परीक्षा के परिणामको निरस्त किया जा चुका है। न्यायालय ने कहा कि जबकिसी परीक्षा में व्यापक पैमाने पर धोखाधड़ी की गई होतब ऐसे में आरोपी के हितों की रक्षा नहीं की जा सकतीहै। इस प्रकार की गड़बडिय़ों से निर्दोष छात्रों पर विपरीतप्रभाव पड़ता है। लिहाजा प्रकरण के तथ्यों को देखने केबाद न्यायालय ने आरोपी को कोई राहत न देते हुएउसके आवेदन को खारिज कर दिया है।

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