ग्वालियर
इस बार कड़ाके की सर्दी पड़ी और 57सालोंका पुराने रिकॉर्ड टूट गए। लगातार घना कोहरा भी हुआ। इससे पाला पड़ा और बिलौआ, आंतरी, संदलपुर क्षेत्र में पान की 90 फीसदी फसल खराब हो गई।
पाला की मार से पान के पत्ते जल गए। यह पत्ते सूखकर बेल से नीचे गिर रहे हैं। पान की फसल में वैसे तो हर साल थोड़ा बहुत नुकसान होता है, लेकिन आंतरी के 82 वर्षीय किसान नंदलाल यादव सहित अन्य बुजुर्ग किसानों का कहना है कि इतना नुकसान 57 साल बाद हुआ है। इससे पहले 1962 में पाला पड़ने से पान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। कृषि विभाग के अफसर भी मान रहे हैं कि पाला पड़ने से पान में बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन अब तक इसका सर्वे नहीं किया गया है। वहीं किसान सर्वे कर मुआवजा दिलाने की मांग कर रहे हैं।
बिलौआ, आंतरी, बरई, संदलपुर और पनिहार क्षेत्र में कई किसान परिवार पान की खेती ही निर्भर हैं लेकिन इस साल दिसंबर के अंतिम सप्ताह में पड़ी कड़ाके की सर्दी के कारण पाला पड़ा और पान के साथ-साथ किसानों के चेहरों की रंगत भी उड़ गई। पाला से इन क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक पान की फसल खराब हो गई है। आंतरी, संदलपुर, बिलौआ, बरई और पनिहार क्षेत्र में 250 भीट में तैयार पान की फसल पाला पड़ने से करीब 2 करोड़ का नुकसान होना बताया जा रहा है। अब किसान मुआवजा के लिए गुहार लगा रहे हैं।
350 से ज्यादा किसान पान की खेती पर निर्भर
आंतरी में 118 परिवार, बिलौआ में 7 परिवार, बरई में 120 परिवार व पनिहार में 130 परिवार पूरी तरह से पान की खेती पर निर्भर हैं। इनमें से 95 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनकी खुद की भीत नहीं है। वे किराए पर जगह लेकर फसल करते हैं। ऐसे में इन किसानों पर पाले से दोहरी मार पड़ी है। इन परिवारों के लोगों ने बताया कि हमें मुआवजा दिया जाए। आमतौर पर 10 डिग्री तक न्यूनतम तापमान तक पत्तों पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन इससे कम तापमान अधिक दिनों तक रहने पर पाला पड़ने की स्थिति बन जाती है।
पानी की एक पारी पर खर्च होते हैं 10-15 हजार रुपए
एक पारी में 10 से 15 हजार की लागत आती है। 800 से 1000 रुपए के खर्च में पान की 200 बेल आती हैं। एक भीट 100 फीट लंबी और 50 से 70 फीट चौड़ी होती है। इसमें 15 से 20 पारी होती हैं। एक पारी से वर्ष में कई बार पान लिया जाता है। सामान्य रूप से पान की एक फसल से पांच से सात बार पान लिया जाता है। इस क्षेत्र का पान आगरा, दिल्ली, कानपुर, मुरादाबाद, झांसी, बरेली और भोपाल के अलावा हरियाणा व मुंबई आदि क्षेत्रों में भी जाता है। काफी समय पहले यहां से पान पाकिस्तान और बांग्लादेश भी जाता था।
पानी की गांठ को गाढ़कर उगाई जाती है बेल
पान की फसल करने के लिए किसानों को लकड़ी और बांस के साथ जगह के लिए भी रुपए देने होते हैं। पानी के लिए अलग से खर्च करना होता है। पान की पारियों में गर्मी में प्रतिदिन चार बार पानी दिया जाता है, जबकि सर्दी में दस दिन में एक बार ही पानी देने की जरूरत पड़ती है। पान की पारियों में पानी मटके से दिया जाता है। पान की गांठ को जमीन में गाढ़कर पान की बेल को बनाया जाता है। बाद में बेल बन जाने पर इसे लकड़ी पर चढ़ा दिया जाता है। क्षेत्र के कई किसान इसी पद्धति से पान की खेती करते हैं।
सलाह: पान के पत्तों पर ग्लूकोज मिला पानी छिड़कें
राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय की कृषि अनुसंधान सेवाएं शाखा के निदेशक डाॅ. एमपी जैन का कहना है कि पान को पाले से बचाने के लिए ग्लूकोज का छिड़काव सबसे कारगर उपाय है। इससे पान की नुकसानित फसल को बचाया जा सकता है। इसके लिए किसान 25 से 30 ग्राम ग्लूकोज 15 लीटर पानी मे घोलकर पान के पत्तों पर झिड़काव करें। इससे फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। यह प्रयोग पान की फसल के लिए कई स्थानों पर प्रचलित भी है। इसे किसान अपना कर अपना नुकसान बचाएं।
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