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हाईकोर्ट ग्वालियर के निर्णय से रद्द हुई फांसी की सजा, युवक को रिहा करने के दिए आदेश

ग्वालियर-हाईकोर्ट ग्वालियर की युगल पीठ ने अपर सत्र न्यायालय भिंड के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें एक महिला व चार बच्चों की हत्या के आरोप में एक आरोपित नीतेश उर्फ अंकुर दीक्षित को फांसी की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त करते हुए कहा कि हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं, कि अभियोजन घटना को प्रमाणित करने में नकाम रहा है। घटना दिनांक को आरोपी मृतकों के साथ देखा नहीं गया था। मामला पूरा संदेहहास्पद है। नीतेश उर्फ अंकुर दीक्षित को बाइज्जत बरी कर दिया।
 
भिंड शहर के वीरेंद्र नगर में स्व शिक्षक शशिकांत शुक्ला की पत्नी रीना शुक्ला (40) बेटी छवि (12), गढा गांव निवासी जेठ वेदप्रकाश शुक्ला की बेटी महिमा (17) के साथ रहती थी। पास में मायका था। मायके से भाई बृजमोहन शर्मा की बेटी अंबिका (15) सोने आती थी।
 
गजना गांव निवासी ममेरे ससुर रामकुमार शर्मा का बेटा गोलू उर्फ अवनीश शर्मा (15) पढने के लिए श्रीमती शुक्ला के घर रह रहा था। 14 मई 2016 दिन शनिवार सुबह श्रीमती शुक्ला के घर हलचल नहीं दिखी तो उनकी मां सियाबेटी ने नाती बेटू (10) को रिश्तेदार के घर से श्रीमती शुक्ला की छत पर भेजा था।
 
बेटू ने खिड़की में सरिया डालकर जीने का गेट खोला और घर में गया था। एक कमरे में रीना, छवि, महिमा और अंबिका के शव पड़े थे। किचन में गोलू का शव था। बेटू ने बाबा श्रीराम शर्मा को लाशों के बारे में बताया था। मृतिका श्रीमती शुक्ला के मोबाइल कॉल डिटेल से पुलिस आरोपित नीतेश उर्फ अंकुर दीिक्षत तक पहुंची थी।
 
आरोपित ने पुलिस को बयान दिया था श्रीमती शुक्ला से उसके संबंध थे। वारदात वाली रात वह मिलने गया था। यहां गोलू ने उन दोनों को देख लिया था। भेद खुलता देख किचन में ले जाकर गोलू के हाथ-पैर बांधकर सब्जी काटने के चाकू से गला रेत दिया था।
 
इसके बाद से महिमा, अंबिका और छवि की गला रेतकर हत्या कर दी थी। हत्याकांड का पर्दाफाश न हो इसके लिए आखिरी में श्रीमती शुक्ला की गला रेतकर हत्या कर दी थी। हत्या के बाद आरोपित घर मेन गेट पर बाहर से ताला डालकर चला गया था।
 
पुलिस ने मामले की जांच कर अंकुर दीक्षित के खिलाफ चालान पेश किया। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश एमएल राठौर ने अंकुर दीक्षित को फांसी की सजा सुनाई थी। फांसी की सजा कन्फर्म होने के लिए मामला हाईकोर्ट आ गया। हाईकोर्ट ने मामले पर फाइनल सुनवाई की। अभियोजन कहीं भी साबित नहीं कराया कि घटना दिनांक को अंकुर को मृतकों के साथ देखा गया था। पूरा मामला संदिग्ध हो गया। उसका लाभ आरोपी को मिला। हाईकोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
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