ग्वालियर –
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उस याचिका को फिर से सुनवाई में ले लिया, जिस याचिका की सुनवाई के दौरान करैरा एसडीओपी बीपी तिवारी ने न्यायमूर्ति के साथ अभद्र व्यवहार किया था। याचिकाकर्ता राजवीर सिंह ने इस याचिका को तथ्य छिपाकर वापस लिया था। साथ ही शासकीय अधिवक्ता ने पूर्व में किए आदेश की जानकारी से हाईकोर्ट को अवगत नहीं कराया था। राजवीर सिंह की याचिका को सुनवाई में लेने के लिए शासन ने पिटीशन लगाई थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
21 जून 2018 को राजवीर सिंह की याचिका की सुनवाई हुई थी। सुनवाई के दौरान शिवपुरी जिले के करैरा एसडीओपी बीपी तिवारी ने न्यायमूर्ति से ऊंची आवाज में बात के साथ-साथ अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल किया था। एसडीओपी ने धमकी देते हुए कहा था कि मैं आपको देख लूंगा। जिस पर वकीलों ने आपत्ति जताई थी।
एसडीओपी बीपी तिवारी, राजवीर सिंह की याचिका का जवाब देने के लिए कोर्ट आए थे। यह याचिका दूसरे कोर्ट में लिस्ट हो गई और याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह कहते हुए याचिका वापस ले ली कि वे उसे चलाना नहीं चाहते हैं। 8 अगस्त 2018 को कोर्ट ने याचिका वापस कर दी। याचिका वापस होने के बाद पूरी कहानी कोर्ट के सामने आई। क्योंकि बीपी तिवारी को अवमानना नोटिस जारी था। कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लेते हुए री स्टोर का नोटिस जारी किया। साथ ही मध्य प्रदेश शासन ने भी राजवीर की याचिका को फिर से सुने जाने के लिए याचिका दायर की। शासन ने तर्क दिया कि याचिका में अवमानना का नोटिस जारी है। ऐसी स्थिति में याचिका वापस नहीं हो सकती है। जिसके बाद कोर्ट ने याचिका को सुनवाई में ले लिया और अब मेरिट पर नया आदेश पारित किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर राजवीर सिंह ने जमानत याचिका भी दायर की, जिसे कोर्ट ने अदम पैरवी में खारिज कर दिया।
क्या है मामला
– शिवपुरी जिले के करैरा थाने की पुलिस, बदमाशों को पकड़ने के लिए गई थी। इस बीच उन्हें गोली चलानी पड़ी इस दौरान एक पुलिसकर्मी को भी गोली लग गई थी। जिसमें पुलिस कर्मी राजवीर सिंह व एक अन्य दोषी पाए गए थे और उनके खिलाफ धारा 307 के तहत केस दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट से इस मामले में आरोपितों को राहत मिल गई थी, लेकिन शासन ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी और केस को री ओपन करा दिया। सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। राजवीर ने एफआईआर को निरस्त करने के लिए याचिका दायर की तो हाईकोर्ट ने डायरी मंगा ली। डायरी में कई कमियां होने के साथ-साथ कांट-छांट भी की गई थी। 2011 से अबतक रहे सभी थाना प्रभारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोर्ट ने डीजीपी को आदेश दिए थे।लेकिन कोर्ट के आदेश का पूरा पालन नहीं हुआ
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