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हमारे बारे में

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बढ़ता कारवाँ अख़बार के साथ हम एक बार फिर आपके बीच हाज़िर हैं. यह अख़बार अपने पहले जीवनकाल में काफी लोकप्रिय हुआ करता था. अख़बार न होकर यह एक आंदोलन हुआ करता था. बीच में कुछ कारणों से इस यात्रा को हमें विराम देना पड़ा था. अब जब हम इसे फिर से आपके बीच लेकर आए हैं, तब भी हमारे सामने वही सवाल थे जो आज से 37 साल पहले हमारे सामने सिर उठा कर खड़े थे. कहा जा सकता है कि कई मायनों में हम विकास की पगडंडी पर चल पड़े हैं. गांवों में भी टीवी और इंटरनेट की धमक सुनाई पड़ने लगी है. मसला लेकिन यह है कि समाज की समस्याएं वही हैं, राजनीति का रंग जस का तस है, वही शोषक हैं और वही शोषित हैं. हम आज भी उसी चौराहे पर खड़े हैं, जहां आज से 37 साल पहले थे. समाज में मौजूद विरोधाभास का रंग कतई नहीं बदला है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि बढ़ता कारवाँ को फिर से प्रकाशित करने के मायने क्या हैं और इस अख़बार का मतलब क्या है

किसी भी नए अख़बार को निकालने के लिए एक नाम की ज़रूरत होती है. उस नाम को लेकर सवाल भी उठते हैं और फिर उसे तर्कसंगत बनाने के लिए तर्कों की कलाबाज़ी दिखाई जाती है. हम ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते हैं. आने वाले समय में अख़बार ख़ुद ही अपने नाम के पीछे का औचित्य आप के सामने सिद्ध कर देगा,

अपने अख़बार के नामकरण के पीछे हमारी ईमानदार कोशिश बस यही है कि इन दुनिया की सत्ता और इस सत्ता के नौकरशाह ने जिन लोगों को हाशिए पर धकेल दिया है, हम उनकी आशा-आकांक्षा, सुख-दुख और उनके संघर्ष का मंच बनें. हम तो बस उन तमाम वंचित और सताए हुए लोगों के हिमायती बनना चाहते हैं, जिनकी आवाज़ इस शोरगुल में कहीं दब कर रह गई है. जो अपने मुल्क में ही कहीं पीछे छूट गए हैं. यही लोग हमारी बढ़ता कारवाँ के नायक हैं. हमारी कोशिश रहेगी कि अपने हक़ और मर्यादा के लिए लड़ता हुआ आदमी इस अख़बार में अपनी सच्ची तस्वीर देख सके और इसे अपने दुख-दर्द का भरोसेमंद साथी समझ सके. आख़िर, किसी भी सच्चे अख़बार का इससे अधिक मतलब भी क्या होगा?

बढ़ता कारवाँ परिवार इसी आसा और बिस्वाश के साथ फिर से आप के बीच में है

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